त्योहार से पहले पुलिस बल को लेकर बड़े-बड़े प्रचार किए गए। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बताने के लिए व्यापक स्तर परएडवर्टाइजिंग और दावे किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत ने अलग तस्वीर पेश की। सवाल यह है कि क्या केवल प्रचार बढ़ा, पर पुलिस की कार्यशैली में अपेक्षित बदलाव नहीं आया?
रंग-गुलाल और जश्न के बीच राजधानी और ग्रामीण इलाकों में हिंसा ने त्योहार को मातम में बदल दिया। एक ही दिन में अलग-अलग थाना क्षेत्रों मेंतीन हत्याएं और दो जानलेवा हमले हुए। भारी पुलिस बल की तैनाती और सख्ती के दावों के बावजूद ऐसी वारदातों ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
थाना आरंग क्षेत्र में रंग लगाने के विवाद ने जानलेवा रूप ले लिया। आरोप है कि संजू निषाद और उसके साथियों ने नीरज लोधी को रोककर पहले मारपीट की और फिर चाकू से सीने पर वार किया। अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर आरोपियों को हिरासत में लिया है।
थाना विधानसभा क्षेत्र के ग्राम मटिया में घरेलू विवाद इतना बढ़ा कि दो भाइयों पर अपने ही सगे भाई दिनेश कुमार विश्वकर्मा की डंडों और मुक्कों से हत्या करने का आरोप है। प्रकरण में संबंधित धाराओं के तहत अपराध दर्ज कर दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है।
थाना खरोरा क्षेत्र के ग्राम माठ में डांस को लेकर हुए विवाद में मोहित धीवर (20) की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। इस हमले में दो अन्य युवक हंसिया के वार से घायल हुए हैं, जिनका उपचार जारी है। आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।
संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बल तैनाती और सख्ती की घोषणाओं के बावजूद दिनदहाड़े चाकूबाजी और हत्या की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि रोकथाम की रणनीति में कमी रही। यदि पुलिस की इतनी सक्रियता होने के बाद भी अपराध की प्रकृति और तरीके पहले जैसे ही बने रहें, तो जनता के मन में संदेह उठना स्वाभाविक है।
गिरफ्तारियां जरूर हुई हैं, लेकिन असली कसौटी अपराध होने से पहले उसे रोकने की है। होली जैसे पर्व पर यदि रंग की जगह खून बहे, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है। राजधानी में बढ़ती हिंसक घटनाएं बता रही हैं कि केवल प्रचार नहीं, बल्कि पुलिसिंग की सोच और कार्यप्रणाली में ठोस बदलाव की आवश्यकता है।



