पुण्यतिथि विशेष: गांधी जी के लिए खेल जीत-हार नहीं, सामाजिक समरसता का रास्ता थे

Madhya Bharat Desk
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30 जनवरी, महात्मा गांधी की पुण्यतिथि, केवल एक स्मृति दिवस नहीं बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का अवसर भी है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारत को ब्रिटिश गुलामी से मुक्त कराने के लिए जिस विचारधारा और संघर्ष का मार्ग दिखाया, वही दर्शन उनके जीवन के हर पहलू में झलकता है—चाहे वह सादगी हो, श्रम हो या खेलकूद और व्यायाम के प्रति दृष्टिकोण।

महात्मा गांधी का मानना था कि शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए नियमित व्यायाम आवश्यक है। वे किताबी ज्ञान से अधिक श्रम और शारीरिक गतिविधि को महत्व देते थे। पैदल चलना, खेती करना और कताई जैसे कार्यों को वे श्रेष्ठ व्यायाम मानते थे। उनके अनुसार, स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ विचार जन्म लेते हैं।

गांधी जी आधुनिक पश्चिमी खेलों की तुलना में भारत के पारंपरिक खेलों और जीवनशैली आधारित गतिविधियों के पक्षधर थे। उनका विश्वास था कि भारत के पारंपरिक खेल केवल शरीर और मस्तिष्क के विकास का साधन नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता और पारिवारिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करते हैं। इसी कारण वे प्रतिस्पर्धा से भरे खेलों की बजाय सामूहिक श्रम, खेती और पैदल चाल जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देते रहे।

महात्मा गांधी भेदभाव और सांप्रदायिक आधार पर आयोजित खेल प्रतियोगिताओं के सख्त विरोधी थे। उनका मानना था कि ऐसे आयोजन समाज में विभाजन और वैमनस्य को जन्म देते हैं। वे कहते थे कि खेल का उद्देश्य लोगों को जोड़ना होना चाहिए, न कि उन्हें अलग करना। उनके लिए खेल एकता, सहयोग और अनुशासन का माध्यम था।

खेलों में हार-जीत को गांधी जी स्वाभाविक मानते थे, लेकिन वे व्यक्तिगत प्रसिद्धि और अहंकार को खेल भावना के विरुद्ध मानते थे। उनके अनुसार, खेल का असली उद्देश्य सामूहिक भाईचारे को मजबूत करना और नैतिक मूल्यों का विकास करना होना चाहिए।

आज, लगभग एक शताब्दी बाद भी, महात्मा गांधी के खेल और व्यायाम से जुड़े विचार उतने ही प्रासंगिक हैं। यदि भारतीय युवा गांधी जी की सोच के अनुरूप एथलेटिक्स जैसे खेलों पर गंभीरता से ध्यान दें, तो वैश्विक मंच पर भारत नई ऊंचाइयों को छू सकता है। गांधी जी की विचारधारा आज की पीढ़ी के लिए स्वास्थ्य, अनुशासन और सामाजिक सौहार्द का मजबूत आधार प्रदान करती है।

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