भारत के बिना बांग्लादेश की स्थिरता मुश्किल, बढ़ता कट्टरपंथ दोनों देशों के रिश्तों के लिए खतरा

Madhya Bharat Desk
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विदेश मामलों के विशेषज्ञ वाएल अव्वाद ने बांग्लादेश में तेजी से उभर रहे कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की है। समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत के सहयोग और सकारात्मक संबंधों के बिना बांग्लादेश का संतुलन बनाए रखना कठिन है।

अव्वाद ने कहा कि हाल के दिनों में बांग्लादेश की सड़कों पर हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं और कट्टरपंथी ताकतें खुलकर सामने आ रही हैं। उन्होंने इसे न केवल बांग्लादेश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया, बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी नकारात्मक असर डालने वाला करार दिया।

उन्होंने आरोप लगाया कि देश के भीतर कुछ समूह सुनियोजित तरीके से भारत-विरोधी माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना था कि इन तत्वों का उद्देश्य दोनों पड़ोसी देशों के बीच अविश्वास और दूरी पैदा करना है, जिससे आम लोगों के बीच भारत के प्रति नकारात्मक भावनाएं फैल रही हैं।

सरकार जिम्मेदारी से नहीं बच सकती

वाएल अव्वाद ने साफ शब्दों में कहा कि सरकार इन घटनाओं को अलग-थलग घटनाएं बताकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि प्रशासन को ठोस कदम उठाने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों।

धार्मिक स्थलों और अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाए जाने पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी पूजा स्थल पर हमला अस्वीकार्य है, चाहे वह हिंदू, ईसाई या अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय से जुड़ा हो। भारत और जनता का भरोसा दोबारा हासिल करने के लिए स्पष्ट आश्वासन और सख्त कार्रवाई बेहद जरूरी है।

अल्पसंख्यकों पर बढ़ती हिंसा

स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बुधवार को राजबाड़ी जिले के पांग्शा उप-जिले के होसेनडांगा गांव में अमृत मंडल नामक एक हिंदू युवक को भीड़ ने बेरहमी से पीट दिया। पुलिस ने उसे गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

इससे पहले मयमनसिंह जिले में 18 दिसंबर को दीपू चंद्र दास नामक युवक की कथित ईशनिंदा के आरोप में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। बाद में उसके शव को लटका कर आग लगा दी गई। जांच में यह सामने आया कि जिस सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर आरोप लगाए गए थे, उसका कोई ठोस सबूत नहीं मिला।

इन घटनाओं ने बांग्लादेश में कानून-व्यवस्था, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और अधिक बिगड़ सकते हैं।

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