बस्तर की जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोढ़ी ने हाल ही में तेलंगाना में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि बस्तर की जनता ने हमेशा अपने अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि उस क्षेत्र के लोगों ने नक्सल संगठन के साथ इसलिए काम किया क्योंकि उनकी लड़ाई कॉर्पोरेट शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ थी। जनता का उद्देश्य सरकार से टकराव नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन को बचाना था।
सोढ़ी ने कहा कि बस्तर की आम जनता और आदिवासी समुदायों ने नक्सल आंदोलन को समर्थन इसलिए दिया क्योंकि वे अपने हक के लिए लड़ रहे थे। लेकिन जब कुछ शीर्ष नेता जैसे रूपेश और भूपति ने सरकार के साथ बातचीत करके आत्मसमर्पण किया, तब उन्होंने उस इलाके की जनता और आदिवासियों से राय नहीं ली। सोनी सोढ़ी के अनुसार, यह निर्णय एकतरफा था और इससे उन लोगों के विश्वास को ठेस पहुंची जिन्होंने इतने वर्षों तक उनके साथ संघर्ष किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार और कॉर्पोरेट घरानों के बीच हुई बातचीत ने आंदोलन की मूल भावना को कमजोर किया। सोढ़ी ने कहा कि अब सबसे ज़्यादा नुकसान आदिवासियों को ही हो रहा है, जिन्होंने हमेशा जंगल और अपनी जमीन की रक्षा के लिए बलिदान दिया। उन्होंने गृह मंत्री पर भी निशाना साधते हुए कहा कि केंद्र सरकार आदिवासियों के मुद्दों को अनदेखा कर रही है और उनकी समस्याओं को केवल सुरक्षा के दृष्टिकोण से देख रही है।
सोनी सोढ़ी ने कहा कि नक्सलवाद केवल बंदूक से खत्म नहीं किया जा सकता। जब तक जनता की समस्याओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीन के अधिकारों को नहीं सुलझाया जाएगा, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने बताया कि उनका लक्ष्य नक्सलियों को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भारत का संविधान देश के हर कोने तक पहुंचे और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा हो।
अंत में सोनी सोढ़ी ने कहा कि आज बस्तर की असली लड़ाई विकास बनाम विस्थापन की है। उन्होंने सरकार से अपील की कि संवाद और विश्वास बहाली के माध्यम से ही इस क्षेत्र में शांति स्थापित की जा सकती है।



