तीनों जांचों में साबित हुई शिक्षक नेता की पत्नी की फर्जी भर्ती, डीपीआई के पास पहुंची रिपोर्ट

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ में शिक्षक नेता की पत्नी की फर्जी नियुक्ति का मामला लगातार सुर्खियों में है। अब तीसरी जांच में भी यह साबित हो गया है कि उनकी भर्ती पूरी तरह फर्जी थी। इसके बावजूद महिला पिछले 17 वर्षों से सरकारी स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। संयुक्त संचालक (जेडी) ने जांच रिपोर्ट और सभी दस्तावेज आगे की कार्रवाई के लिए डीपीआई (लोक शिक्षण संचालनालय) को भेज दिए हैं।

17 साल से फर्जी भर्ती पर नौकरी

छत्तीसगढ़ टीचर्स एसोसिएशन के प्रदेशाध्यक्ष संजय शर्मा की पत्नी चंद्ररेखा शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी नियुक्ति पत्र और ट्रांसफर आदेश के जरिए शिक्षक की नौकरी हासिल की। बताया गया कि वे वर्तमान में शासकीय प्राथमिक शाला, मोपका में पदस्थ हैं।

शिकायत में कहा गया कि उन्होंने 11 जनवरी 2007 को जारी कथित नियुक्ति आदेश (क्रमांक 2229) और 24 जुलाई 2007 के फर्जी स्थानांतरण आदेश (क्रमांक 264) तैयार कर खुद को नगर पंचायत पत्थलगांव के अंतर्गत स्कूल में नियुक्त दिखाया। इसके बाद उन्होंने जनपद पंचायत बिल्हा से एनओसी लेकर वहां कार्यभार ग्रहण कर लिया।

तीन जांचों में भर्ती निकली फर्जी

पहली जांच संयुक्त संचालक सरगुजा ने कराई थी। शिकायत के बाद बिलासपुर के जेडी ने दोबारा तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई। हालांकि चंद्ररेखा शर्मा ने जांच समिति के एक सदस्य पर प्रतिवेदन वायरल करने का आरोप लगाया था। इसके बाद तीसरी जांच समिति गठित की गई।

तीनों जांचों की रिपोर्ट में भर्ती को फर्जी पाया गया, और शिकायतकर्ता के आरोप सही साबित हुए। इस आधार पर जेडी आर. पी. आदित्य ने जांच प्रतिवेदन डीपीआई को भेजते हुए आगे की कार्रवाई की अनुशंसा की है।

13 महीनों में भी कार्रवाई नहीं

मोपका स्कूल में पदस्थ शिक्षिका की फर्जी नियुक्ति की शिकायत 13 महीने पहले की गई थी। तीन बार जांच पूरी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। महिला अब भी स्कूल में पढ़ा रही हैं। शिकायतकर्ता ने बताया कि अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो वे हाईकोर्ट की शरण लेंगे।

डीपीआई करेंगे आगे की कार्रवाई

जेडी आर. पी. आदित्य ने बताया,

“शिक्षिका चंद्ररेखा शर्मा की नियुक्ति जांच में फर्जी पाई गई है। रिपोर्ट और दस्तावेज डीपीआई को भेज दिए गए हैं। अब आगे की कार्रवाई डीपीआई के स्तर पर होगी।”

प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल

यह मामला न सिर्फ भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि फर्जी नियुक्ति जैसे गंभीर अपराध पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या किसी राजनीतिक दबाव का परिणाम?

जब फर्जीवाड़ा तीन जांचों में साबित हो चुका है, तो दोषियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यह स्थिति शासन की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

जरूरी है त्वरित कार्रवाई

जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि इस मामले में तुरंत और सख्त कदम उठाए जाएं। यदि दोषियों को दंडित नहीं किया गया, तो ऐसी घटनाएं भविष्य में बार-बार दोहराई जा सकती हैं और सरकारी व्यवस्थाओं पर से आम जनता का भरोसा उठ सकता है।

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