ग्राम कल्याणपुर (अकलतरा) में सरपंच और सचिव की अनुमति से निजी कंपनी ने राखड़ पटाने के लिए तालाब पाट दिया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुसार यह गैरकानूनी है। पुनर्निर्माण के लिए तय 7.77 लाख रुपये भी अब तक जमा नहीं किए गए। तालाब बंद होने से सैकड़ों ग्रामीण परिवारों की सिंचाई व जल उपयोग प्रभावित हुआ है, लेकिन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत के कारण अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिससे ग्रामीण आक्रोशित हैं।

यह मामला सिर्फ़ एक तालाब को पाटने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र की नाकामी और मिलीभगत को उजागर करता है। ग्राम कल्याणपुर का तालाब, जो वर्षों से ग्रामीणों की ज़रूरतों को पूरा कर रहा था, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की अनुमति से निजी कंपनी को राखड़ पटाने के लिए सौंप दिया गया।
पुनर्निर्माण के लिए तय की गई 7 लाख 77 हज़ार 900 रुपये की राशि आज तक जमा नहीं की गई, और प्रशासन अब भी मूकदर्शक बना हुआ है। सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो क्या क़ानून केवल आम नागरिकों को डराने के लिए ही बचा है?
जब कोई ग़रीब या सामान्य नागरिक मामूली नियम भी तोड़ता है, तो तत्काल कार्रवाई होती है, लेकिन नेताओं और रसूखदारों के संरक्षण में पल रहे भ्रष्टाचारी वर्षों तक बचते रहते हैं। आखिर क्यों? किसके दबाव और इशारे पर जनता के अधिकारों का तालाब निजी हाथों में सौंप दिया गया?
यह मामला साफ़ दिखाता है कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था ताक़तवरों के सामने कितनी कमज़ोर हो चुकी है। अगर अब भी इस लापरवाही और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में हर सार्वजनिक संसाधन इसी तरह हड़प लिए जाएंगे। सरकार और प्रशासन को जवाब देना ही होगा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी करने वालों पर कार्रवाई कब और कैसे होगी, वरना जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा।







