छत्तीसगढ़ से वनतारा पार्क भेजे गए सफेद भालू और हिरण को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है। वन्य-प्राणी प्रेमियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन जानवरों को भेजने में निर्धारित प्रोटोकॉल और नियमों का पालन नहीं किया गया। उनका आरोप है कि बिना उचित अनुमति और वैज्ञानिक प्रक्रिया के इन दुर्लभ प्रजातियों को स्थानांतरित करना वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की भावना के खिलाफ है।
इस मामले ने और अधिक तूल इसलिए पकड़ लिया है क्योंकि हाल ही में माधुरी हथिनी विवाद ने भी सुर्खियां बटोरी थीं। उस समय भी यह सवाल उठा था कि क्या पशु संरक्षण के नाम पर प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता बरती जा रही है या नहीं। अब सफेद भालू और हिरण को लेकर उठी मांग ने वन विभाग और सरकार दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वन्यजीवों को उनकी मूल भौगोलिक परिस्थितियों से हटाकर किसी अन्य जगह भेजने से उनकी सेहत और जीवन पर गंभीर असर पड़ता है। सफेद भालू जैसे जीवों को विशेष तापमान, भोजन और देखभाल की जरूरत होती है, जबकि हिरण अपने प्राकृतिक आवास में अधिक सुरक्षित रहते हैं। यदि इन प्राणियों को कृत्रिम वातावरण में रखा गया, तो उनका प्राकृतिक व्यवहार और जीवनचक्र प्रभावित हो सकता है।
पशु प्रेमियों ने स्पष्ट रूप से मांग की है कि इन सफेद भालू और हिरण को तुरंत छत्तीसगढ़ वापस लाया जाए और भविष्य में ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले पारदर्शिता और वैज्ञानिक प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए। उनका कहना है कि वन्यजीव केवल आकर्षण का साधन नहीं हैं, बल्कि वे पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, जिन्हें उनके प्राकृतिक आवास से वंचित करना नैतिक और कानूनी रूप से गलत है।
इस विवाद ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या प्रशासनिक फैसले पर्यावरणीय और जैव विविधता के हित में लिए जा रहे हैं या फिर किसी अन्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और वन विभाग इस मामले में आगे क्या कदम उठाते हैं।







