राहुल गांधी इस बार बिहार विधानसभा चुनावों में सीमांचल से कांग्रेस की सियासी पारी को मजबूत करने में जुटे हैं। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि सीमांचल ही इस बार सत्ता की चाभी घुमाएगा। यहां अल्पसंख्यक, पिछड़ा और अतिपिछड़ा समाज की निर्णायक भूमिका है, लेकिन वोटों का लगातार बिखराव कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सीमांचल में एनडीए और महागठबंधन के अलावा AIMIM और जन सुराज की मौजूदगी वोटों को और अधिक बिखरा सकती है। राहुल गांधी इस हकीकत को भली-भांति समझते हैं कि यदि अल्पसंख्यक और ओबीसी वोट एकजुट नहीं हुए तो कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि वे लगातार गांव-गांव जाकर इस क्षेत्र में कांग्रेस की पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
तेजस्वी यादव का आत्मविश्वास राहुल गांधी पर दबाव और बढ़ा रहा है। कदवा की जनसभा में तेजस्वी ने यह साफ कर दिया कि बिहार की राजनीति में मुकाबला केवल नीतीश कुमार और उनके बीच है। उन्होंने मंच से कहा कि जब सरकार लगातार उनके और महागठबंधन की घोषणाओं पर ही काम कर रही है तो बिहार को “डुप्लीकेट” नहीं बल्कि “ओरिजिनल सीएम” चाहिए। तेजस्वी का यह आक्रामक रुख कांग्रेस को यह साबित करने की चुनौती देता है कि वह सिर्फ सहयोगी दल नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति भी है।
सीमांचल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां का वोट अक्सर हिंदू-मुस्लिम बाइनरी में बंटता रहा है। धार्मिक दंगों और पिछले चुनावों के अनुभव ने इसे बार-बार चर्चा में रखा है। मुस्लिम समाज अब तक बड़े पैमाने पर आरजेडी के साथ खड़ा रहा है, लेकिन कांग्रेस यहां अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी को अब यह साबित करना होगा कि उनकी पार्टी न केवल महागठबंधन का हिस्सा है, बल्कि चुनावी जंग में निर्णायक भूमिका भी निभा सकती है।
दूसरी ओर, एनडीए फिलहाल खामोश नजर आ रहा है। माना जा रहा है कि भाजपा और जदयू महागठबंधन और कांग्रेस के भीतर की खींचतान का फायदा उठाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऐसे में सीमांचल में होने वाली हलचल ही तय करेगी कि आगामी बिहार विधानसभा चुनावों में कौन-सी पार्टी सत्ता की चाभी अपने हाथ में ले पाएगी।







