अहमदाबाद के साबरमती नदी तट पर स्थित मोटेरा आश्रम, जो पिछले 53 वर्षों से संत श्री आशारामजी बापू के मार्गदर्शन में ध्यान, भक्ति, सेवा, योग और Inner Peace का अनूठा केंद्र रहा है, अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
यह आश्रम हिंदू धर्म के संरक्षण-संवर्धन का जीवंत प्रतीक है। हर वर्ष यहाँ लाखों साधक — जिनमें कई विदेशी भी होते हैं — ध्यान योग शिविरों में भाग लेकर आंतरिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं।

अब इस पवित्र स्थल को मात्र 50 दिनों के ओलंपिक आयोजन के लिए बलिदान करने की तैयारी है। यह केवल एक इमारत नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों की आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का केंद्र है।
सवाल साफ है — क्या यह विकास है, या हमारी आध्यात्मिक जड़ों को काटने की साजिश?
भारत को आगे बढ़ाया जा रहा है, या अपनी ही विरासत से पीछे धकेला जा रहा है?



