छत्तीसगढ़ के खरोरा, मंदिर हसौद, आरंग और अभनपुर तहसील के लगभग 35 गांवों से होकर नई रेलवे लाइन गुज़रने वाली है, जो खरसिया-नवा रायपुर-परमलकसा मार्ग को जोड़ेगी। इस परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण का कार्य प्रारंभ हो गया है और जिन गांवों से यह रेललाइन गुज़रेगी, वहां मुआवजे की संभावना को देखते हुए बड़े पैमाने पर जमीनों की खरीद-बिक्री की जा रही है।
भारतमाला परियोजना की तर्ज पर भूमि अधिग्रहण से मिलने वाले मुआवजे की उम्मीद में इन गांवों में भूमि का बंटवारा और रजिस्ट्री का काम तेज़ी से हुआ है। कई मामलों में एक ही जमीन के कई टुकड़े करके अलग-अलग लोगों के नाम पर रजिस्ट्री कराई गई है। दैनिक भास्कर की पड़ताल में यह बात सामने आई कि अधिकांश किसानों ने अपनी जमीनों को या तो परिजनों के नाम पर दान पत्र के माध्यम से ट्रांसफर कर दिया या फिर बाजार में बेच दिया।
इस परियोजना की चर्चा लगभग छह साल पहले शुरू हुई थी, लेकिन हाल के महीनों में जमीन की खरीद-बिक्री तेज़ हो गई है। अप्रैल महीने में तो जमीन की खरीद पर प्रतिबंध लगाने की बात सामने आई। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मुआवजे की उम्मीद में लोग भूमि की स्थिति बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
रेलवे विभाग ने इस स्थिति को देखते हुए कलेक्टर को एक चिट्ठी लिखी है, जिसमें जिन गांवों से यह रेल लाइन गुज़रने वाली है, वहां जमीन की खरीद-बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। दक्षिण-पूर्व-मध्य रेलवे बिलासपुर के उपमुख्य अभियंता द्वारा भेजी गई इस चिट्ठी में स्पष्ट कहा गया है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी है।
इस पूरी प्रक्रिया ने ग्रामीण क्षेत्रों में ज़मीन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता की आवश्यकता को उजागर किया है। यदि समय रहते प्रशासन सख्ती नहीं बरतता, तो मुआवजे को लेकर भविष्य में बड़े विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।



