सार
मराठी भाषा के नाम पर हिंदी के खिलाफ हो रही राजनीति का नया अध्याय ठाकरे परिवार की एकजुटता से खुलता है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे, जो वर्षों तक एक-दूसरे के कट्टर राजनीतिक विरोधी रहे, अब मराठी अस्मिता की रक्षा के नाम पर एक ही मंच पर नजर आ रहे हैं।
विस्तार
इस कथित एकता का उद्देश्य सिर्फ भाषाई गर्व नहीं, बल्कि आगामी मुंबई नगर निगम चुनावों और महाराष्ट्र की सत्ता को साधना है। यह रणनीति तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में देखी गई भाषाई ध्रुवीकरण की राजनीति की तरह है, जहां हिंदी को ‘बाहरी भाषा’ कहकर जनता की भावनाओं को भड़काया जाता है।
मंच साझा करना और भाषाई चेतना के नाम पर हिंदी का विरोध करना एक सोची-समझी राजनीतिक चाल है। लेकिन महाराष्ट्र जैसे राज्य, जहां हिंदी साहित्य, फिल्म और संगीत ने अपार योगदान दिया है, वहां यह विरोध आत्मविरोधी प्रतीत होता है।
क्या अब यह नेता हिंदी सिनेमा को भी महाराष्ट्र से बाहर करने की मांग करेंगे, जिसने लाखों मराठी भाषियों को पहचान, रोजगार और समृद्धि दी है?
सच्चाई यह है कि हिंदी देश की सबसे बड़ी संपर्क भाषा बन चुकी है। यह लोकप्रियता किसी थोपने के कारण नहीं, बल्कि स्वीकृति से आई है।
भले ही भाजपा राजनीतिक वजहों से इस मुद्दे पर खुलकर न बोले, लेकिन केंद्र सरकार को चाहिए कि वह यह स्पष्ट करे कि हिंदी का विकास किसी पर थोपने का परिणाम नहीं, बल्कि देशवासियों की पसंद का सम्मान है।
जो हिंदी को खतरनाक बताकर जनता को बरगलाना चाहते हैं, वे न केवल भाषाई समरसता को ठेस पहुंचा रहे हैं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी के वर्चस्व को बढ़ावा दे रहे हैं।



