नई दिल्ली।भारत की कॉर्पोरेट दिवालिया प्रक्रिया में अडानी समूह की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। 2018 से अब तक अडानी समूह और उससे जुड़े संस्थानों ने 26 दिवालिया कंपनियों को खरीदने के लिए बोली लगाई, जिनमें से 16 कंपनियां उसे मिल गईं यानी लगभग हर पांच में से तीन बोली जीतने की दर।
1.31 लाख करोड़ का कर्ज, 33 हजार करोड़ की वसूली
इन 16 अधिग्रहणों में कर्जदारों मुख्य रूप से बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर कुल 1.31 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का दावा दर्ज था। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक कर्जदारों को केवल करीब 33,000 करोड़ रुपये ही मिले, जो कुल दावे का लगभग 25.4 फीसदी है।
यानी जिन कंपनियों का कर्ज चुकाना मुश्किल हो गया था, उन्हें दिवालिया प्रक्रिया में बेचकर कर्जदारों को कर्ज का सिर्फ एक चौथाई हिस्सा ही वापस मिला। बाकी राशि को “हेयरकट” यानी नुकसान कहा जाता है।
लैंको अमरकंटक: तय सौदे के बाद नई बोली
इस कहानी का सबसे चर्चित उदाहरण लैंको अमरकंटक पावर है। यह कंपनी 2019 में दिवालिया हुई थी और बैंकों पर उसका करीब 12,000 करोड़ रुपये का बकाया था।
पहले पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन और REC के संयुक्त समूह की 3,020 करोड़ रुपये की बोली को कर्जदारों की समिति ने स्वीकार कर लिया था और उसकी योजना NCLT की मंजूरी के लिए भेज दी गई थी। लेकिन इसी बीच अडानी पावर, जिंदल पावर और मेघा इंजीनियरिंग ने बिना बोली के ज्यादा राशि के प्रस्ताव भेजे। अडानी ने पहले 3,645 करोड़ और बाद में 4,101 करोड़ रुपये की पेशकश की।
कर्जदारों ने प्रक्रिया दोबारा खोलने का फैसला लिया और NCLT ने जनवरी 2024 में नई नीलामी की इजाजत दे दी। नए दौर में अडानी पावर इकलौती बोलीदार रही और उसे सौदा मिल गया। NCLT ने अगस्त 2024 में इस अधिग्रहण को मंजूरी दे दी।
जयप्रकाश एसोसिएट्स: देर से बढ़ी बोली खारिज
जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड, यानी JAL, के मामले में तस्वीर उलटी दिखी। यहां वेदांता की बोली कुल मूल्य के लिहाज से अडानी की पेशकश से ज्यादा थी वेदांता की राशि करीब 16,726 से 17,926 करोड़ रुपये के बीच बताई गई, जबकि अडानी की मंजूर योजना 14,535 करोड़ रुपये की थी।
लेकिन कर्जदारों ने कहा कि वेदांता ने अपनी बोली तय समय-सीमा के बाद बढ़ाई थी। उनका तर्क था कि अंतिम दौर के बाद बोली बदलने की इजाजत नहीं है, क्योंकि इससे पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ेगी। अडानी की योजना में करीब 6,000 करोड़ रुपये की तत्काल राशि और दो साल में भुगतान की तेज शर्तें भी थीं।
NCLT ने मार्च 2026 में अडानी की योजना मंजूर की। वेदांता की अपील के बाद NCLAT ने मई 2026 में कर्जदारों के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि बोली का मूल्यांकन केवल कुल राशि पर नहीं, बल्कि भुगतान की निश्चितता, समय और प्रक्रिया के अनुपालन पर भी निर्भर करता है।
बड़ा सवाल: बेहतर बोली आए तो प्रक्रिया कब खुलेगी?
दोनों मामलों में सवाल एक ही है जब किसी खरीदार की बोली ज्यादा हो, तो क्या नीलामी दोबारा खोली जा सकती है? लैंको में ऐसा हुआ, जबकि जयप्रकाश में देर से आई बेहतर बोली को खारिज कर दिया गया।
कानूनी रूप से फर्क यह है कि लैंको में नई बोलियां अंतिम मंजूरी से पहले आईं और NCLT ने नया चैलेंज प्रक्रिया की अनुमति दी। जयप्रकाश में वेदांता का संशोधन बोली प्रक्रिया बंद होने के बाद आया, इसलिए उसे देर की पेशकश माना गया।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का कहना है कि दिवालिया प्रक्रिया का उद्देश्य कंपनी को बचाना और कर्जदारों की वसूली बढ़ाना दोनों हैं। लेकिन जब एक ही तरह की स्थिति में अलग-अलग फैसले हों, तो पारदर्शिता और नियमों की एकरूपता पर सवाल उठते हैं।
अडानी समूह के पक्ष में दलील रही है कि सभी बोलीदारों को बराबर मौका मिला और कर्जदारों का व्यावसायिक निर्णय कानून के दायरे में था। लेकिन आलोचकों का कहना है कि बड़े समूहों के पास पूंजी, कानूनी टीम और तेज भुगतान की क्षमता होने से उन्हें दिवालिया नीलामी में फायदा मिलता है।






