इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में सरकारी और सार्वजनिक भूमि पर हो रहे अवैध अतिक्रमण के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि ग्राम सभा की भूमि, सार्वजनिक मार्गों और लोक उपयोग के लिए आरक्षित जमीन से अवैध कब्जा 90 दिनों के भीतर हटाया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई केवल आदेश जारी करने तक सीमित नहीं मानी जाएगी, बल्कि धरती पर वास्तविक कार्रवाई कर भूमि को मूल उपयोग के लिए बहाल किया जाना जरूरी होगा।
हाईकोर्ट के अनुसार, ग्राम प्रधान और लेखपाल ग्राम सभा की भूमि के संरक्षक हैं। अतिक्रमण की जानकारी मिलते ही उन्हें 60 दिनों के भीतर आर.सी. फॉर्म-19 के माध्यम से तहसीलदार को सूचना देनी होगी। इसके बाद तहसीलदार को उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी कर 90 दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पूरी करनी होगी।



कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि ग्राम प्रधान, लेखपाल, राजस्व अधिकारी या भूमि प्रबंधन समिति के सदस्य समय रहते अतिक्रमण की सूचना देने या उसे हटाने में नाकाम रहते हैं, तो यह भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 316 के तहत आपराधिक विश्वासघात यानी अमानत में खयानत माना जाएगा। ऐसे पदाधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक कार्रवाई भी की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कोई तहसीलदार बिना पर्याप्त कारण के 90 दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पूरी नहीं करता, तो उसे कदाचार माना जाएगा। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक भूमि आम नागरिकों की संपत्ति है और इसकी रक्षा स्थानीय प्रशासन तथा ग्राम स्तर के पदाधिकारियों की कानूनी जिम्मेदारी है।
इस फैसले से उम्मीद जताई जा रही है कि प्रदेशभर में तालाबों, चारागाहों, सार्वजनिक रास्तों और ग्राम सभा की भूमि पर बढ़ रहे अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई तेज होगी। साथ ही अतिक्रमण करने वालों के अलावा इस मामले में लापरवाही बरतने वाले प्रशासनिक अधिकारियों और ग्राम स्तर के पदाधिकारियों पर भी जवाबदेही तय होगी।





