छत्तीसगढ़ में राजनीतिक दल धान के खेत से वोट की फसल काटते हैं, लेकिन धान खरीदी-बिक्री में घोटाले की फसल भी हर साल लहलहाती है। अब लगने लगा है कि किसानों के धान से ज्यादा सरकारों को घोटालों की पैदावार पर भरोसा है। जनता के खून-पसीने की अरबों रुपये की कमाई की डकैती का यह सिलसिला आखिर कब रुकेगा? खरीफ वर्ष 2025-26 की धान खरीदी बंद हुए करीब छह महीने बीत चुके हैं, लेकिन खरीदी और उठाव का अंतिम मिलान अब तक पूरा नहीं हुआ है। इस बीच प्रदेश के खरीदी और संग्रहण केंद्रों में करीब 350 करोड़ रुपये के 1.16 लाख टन धान का हिसाब गड़बड़ मिला है।
जानकारी के मुताबिक, खरीदी केंद्रों में करीब 211 करोड़ रुपये का 68 हजार टन, जबकि मार्कफेड के 78 संग्रहण केंद्रों में करीब 149 करोड़ रुपये का 48 हजार टन धान कम पाया गया है। यानी रिकॉर्ड में दर्ज धान और मौके पर मौजूद स्टॉक के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। पड़ताल के दौरान कहीं खाली मैदान मिला, कहीं धान की जगह भूसा पड़ा मिला तो कहीं गिनती की सड़ती हुई बोरियां ही बची थीं।
समितियों पर सख्ती, संग्रहण केंद्रों पर नरमी?
धान खरीदी व्यवस्था में कार्रवाई के दोहरे पैमाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। खरीदी समितियों में आधा प्रतिशत से कम कमी मिलने पर भी प्रदेशभर में एफआईआर और वसूली की कार्रवाई की गई है। दूसरी ओर, संग्रहण केंद्रों में शॉर्टेज पिछले पांच वर्षों में कई गुना बढ़ने के बावजूद कार्रवाई सीमित दिखाई देती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, संग्रहण केंद्रों में शॉर्टेज 2021-22 में 2.78 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 9 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
समितियों के लिए शून्य सूखत, संग्रहण केंद्रों को 1% छूट
नियमों के अनुसार समितियों के खरीदी केंद्रों में सूखत की स्वीकार्य सीमा शून्य है। एक बोरी भी कम मिलने पर कमीशन से वसूली और एफआईआर तक का प्रावधान है। वहीं संग्रहण केंद्रों को एक प्रतिशत तक की छूट दी जाती है। इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि संग्रहण केंद्रों में शॉर्टेज लगातार गंभीर स्तर पर रही।
| वर्ष | खरीदी केंद्र | संग्रहण केंद्र |
|---|---|---|
| 2021-22 | 0.05% | 2.78% |
| 2022-23 | 0.01% | 2.02% |
| 2023-24 | 0.27% | 9.00% |
| 2024-25 | 0.45% | 4.17% |
| 2025-26 | अंतिम आंकड़े उपलब्ध नहीं | अंतिम आंकड़े उपलब्ध नहीं |
कहीं भूसा, कहीं खाली मैदान, कहीं सड़ती बोरियां
आसुलखार: कांकेर के आसुलखार संग्रहण केंद्र में रिकॉर्ड के मुताबिक करीब 1.75 करोड़ रुपये का 5,658 क्विंटल धान दर्ज है। मौके पर खाली मैदान में कैप कवर के नीचे भूसे का ढेर मिला।
लखनपुरी-उरकुड़ा: रिकॉर्ड में 16,154 क्विंटल धान दर्ज है, लेकिन मौके पर एक बोरी भी नहीं मिली। इसी तरह कोंडागांव मुख्यालय के संग्रहण केंद्र में 2,537 क्विंटल धान दर्ज होने के बावजूद केंद्र खाली मिला।
तालाकुर्रा: कांकेर की मरकाटोला समिति के तालाकुर्रा केंद्र में करीब 1.18 करोड़ रुपये का 3,827 क्विंटल धान दर्ज था। मौके पर करीब 100 बोरियां ही मिलीं, जिनमें से कई सड़ रही थीं। बताया गया कि समय पर उठाव नहीं होने के कारण यह स्थिति बनी।
बफना: कोंडागांव के बफना केंद्र में एक बोरी भी नहीं मिली, जबकि रिकॉर्ड में अभी भी 3.25 प्रतिशत उठाव बाकी बताया जा रहा है। अंतिम मिलान में इसकी भरपाई समिति के कमीशन से किए जाने की बात सामने आई है।
IIT खड़गपुर की स्टडी भी उठाती है सवाल
धान खरीदी से जुड़े एक अधिकारी के अनुसार, सूखत का वास्तविक स्तर जानने के लिए खाद्य निगम ने आईआईटी खड़गपुर से अध्ययन कराया था। रायपुर और जांजगीर के कुछ संग्रहण केंद्रों के स्टैक निगरानी में रखे गए थे। इनमें तीन प्रतिशत से अधिक सूखत मिलने की बात कही गई है। हालांकि यह रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है।
बड़ा सवाल—धान गया कहां?
धान खरीदी में किसानों से एक-एक दाने का हिसाब लेने वाली व्यवस्था में जब रिकॉर्ड के मुकाबले करोड़ों रुपये का धान कम मिलता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह धान गया कहां? प्राकृतिक सूखत, उठाव में देरी और भंडारण की समस्या अपनी जगह हो सकती है, लेकिन अलग-अलग केंद्रों पर रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक के बीच सामने आ रहे बड़े अंतर ने पूरी व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
किसानों से धान खरीदना सिर्फ सरकारी आंकड़ा पूरा करना नहीं, बल्कि जनता के पैसे से खरीदे गए अनाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी है। इसलिए 350 करोड़ रुपये के आसपास के इस अंतर का अंतिम मिलान, जिम्मेदारों की जवाबदेही और कार्रवाई की पूरी जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है।





