तस्वीर छत्तीसगढ़ के दूसरे सबसे बड़े शहर बिलासपुर की है, जहां राज्य का हाईकोर्ट भी स्थित है।
कुछ साल पहले यही शहर भीषण गर्मी के दौरान 50 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचने की चर्चा में था। आज वही बिलासपुर रिकॉर्डतोड़ बारिश से जूझ रहा है। यह सिर्फ एक मौसमीय घटना नहीं, बल्कि बदलते जलवायु चक्र की गंभीर चेतावनी है।
बिलासपुर में बीते 24 घंटे के दौरान 415.6 मिमी (करीब 16 इंच) बारिश दर्ज की गई, जिसने 93 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। इससे पहले 1933 में 14.93 इंच बारिश का रिकॉर्ड दर्ज हुआ था।
लगातार बारिश से पूरा शहर जलमग्न हो गया। कई इलाकों में कमर तक पानी भर गया, कॉलोनियां और घर डूब गए। लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए मोटर बोट का सहारा लेना पड़ा। रेलवे ट्रैक पानी में डूबने से कई ट्रेनें प्रभावित हुईं। हाईवे और पुलों पर आवाजाही रोकनी पड़ी। स्कूल बंद रहे और बच्चों की परीक्षाएं तक स्थगित करनी पड़ीं।
बारिश का असर बिजली व्यवस्था पर भी पड़ा। करीब दो दर्जन ट्रांसफॉर्मर पानी में डूब गए, जिससे शहर के कई हिस्सों में बिजली आपूर्ति बाधित रही। बाढ़ में डूबने से एक महिला की मौत हो गई।
मौसम विभाग ने अगले दो दिनों तक भारी बारिश की चेतावनी जारी की है, जिससे स्थिति और गंभीर होने की आशंका जताई जा रही है।
बिलासपुर संभाग के अन्य जिलों में भी अच्छी बारिश दर्ज की गई। जांजगीर में 170 मिमी, सारंगढ़-बिलाईगढ़ में 75 मिमी, मुंगेली में 58.8 मिमी, कोरबा में 47.4 मिमी, सक्ती में 38.5 मिमी, रायगढ़ में 34 मिमी और जीपीएम में 33.7 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई।
यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि मौसम का मिज़ाज यूँ ही नहीं बदल रहा। बढ़ते तापमान, जंगलों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण और प्रकृति के साथ लगातार हो रही छेड़छाड़ का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। कभी भीषण गर्मी और कभी रिकॉर्डतोड़ बारिश—ये चरम मौसम की घटनाएं अब अपवाद नहीं, बल्कि नई हकीकत बनती जा रही हैं।
अब भी समय है। अगर आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देना है, तो बचे-खुचे जंगलों, जलस्रोतों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करनी होगी। प्रकृति के साथ संतुलन ही इस संकट से निकलने का सबसे बड़ा रास्ता है।





