रायपुर। NRDA द्वारा जारी टेंडर को लेकर एकबार फिर सवाल उठने लगे है। करोड़ों का घोटाला, अधिकारियों में पैसो का खुलेआम बंदरबांट और जनता एवं सरकारी पैसों का करोड़ों रुपए का दुरुपयोग सामने आया है।
नया रायपुर विकास प्राधिकरण (NRDA) द्वारा राजधानी रायपुर और नया रायपुर के बीच टाउनशिप डेवलपमेंट का टेंडर जारी किया गया है जिसकी लागत 800 करोड़ रुपए है। सवाल उठ रहे है कि इस तरह का टेंडर जनता और सरकारी पैसों का पूरी तरह दुरुपयोग है, टाउनशिप के नाम पर अधिकारियों के बीच खुलेआम बंदरबांट चल रहा है, इस तरह के डेवलपमेंट स्कीम का कोई औचित्य नहीं है।
आरोप है कि NRDA के इस टेंडर के पीछे पैसा बांटने का बड़ा खेल चल रहा है। असली कहानी तो यहां है कि सरकार निर्माण एजेंसी को टाउनशिप डेवलपमेंट के बदले 200 एकड़ जमीन देने वाली है। यदि रायपुर में कहीं जमीन के रेट लिस्ट की बात करे तो कमसे कम 3000 रुपए स्क्वायर फीट में बेची जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस जगह पर टाउनशिप डेवलपमेंट के बाद इस जमीन का रेट लगभग 6 से 7 हजार रुपए स्क्वायर फीट हो जाएगा यानी लगभग 6000 करोड़ रुपए उस निर्माण एजेंसी के हाथों सीधा चला जाएगा।
जानकारी के अनुसार सरकार प्राइवेट बिल्डरों को निर्माण के बदले जमीन देगी जिससे राज्य सरकार को राजस्व आयेगा। परंतु इस टेंडर में NRDA और उसके अधिकारियों ने बिना किसी गणना के निर्माण के बदले बिल्डर्स को 200 एकड़ जमीन देने की बात कही है जिसका मूल्य लगभग 6000 करोड़ रुपए है। आरोप है कि इसमें NRDA के अधिकारी और उसके चहेते ठेकेदारों की पूरी तरह मिलीभगत है जो सिर्फ पैसे गबन करने में लगे हुए है। बिना किसी गणना के जमीन को बिल्डर्स के हाथ में दे देना इसका कोई और औचित्य ही नहीं बनता।
राज्य का सबसे बड़ा घोटाला!
आरोप लग रहे है कि डेवलपमेंट के नाम पर राज्य में NRDA का यह सबसे बड़ा घोटाला है जिसमें सरकारी पैसों और जनता के पैसों का दुरुपयोग तो हो ही रहा है पर निर्माण के बदले 200 एकड़ जमीन को निर्माण एजेंसियों के नाम पर चढ़ा देना कुछ हजम नहीं हो रहा है। यानी 6000 करोड़ का सीधा सीधा महाघोटाला है।
इसका औचित्य जानने और जानकारी के लिए NRDA के एक अधिकारी हरिओम शर्मा को फोन मिलाया गया उनके द्वारा जवाब दिया गया कि बाद में फोन करके बताता हूँ परंतु बाद में दोबारा फोन के उपरांत उन्होंने कॉल का जवाब नहीं दिया इसका सीधा मतलब यही है कि अधिकारी कोई भी जानकारी साझा नहीं करना चाहता क्योंकि इस तरह के टेंडर को सिर्फ पैसों के बंदरबांट के लिए निकाला जाता है और जनता के कान में विकास का ढिंढोरा पीट कर उनको शांत कर दिया जाता है।

फिलहाल टेंडर निर्माण एजेंसियों के हाथ में आ गया है और अब देखना होगा कितना विकास हो पाता है और इसका औचित्य क्या होता है।





