बोधघाट परियोजना के विरोध में बस्तर के 56 गांवों में आक्रोश

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में लंबे समय से चर्चा में रही विवादित बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर एक बार फिर विरोध तेज हो गया है। हाल ही में परियोजना क्षेत्र में शुरू हुए सर्वे कार्य के बाद प्रभावित गांवों के लोगों में अपनी जमीन और संस्कृति खोने का डर बढ़ गया है।

इसी मुद्दे को लेकर हर्राकोडेर गांव में प्रभावित ग्रामीणों, सरपंचों और ‘बोधघाट बचाओ संघर्ष समिति’ के पदाधिकारियों की एक अहम बैठक हुई। बैठक में सभी ने एकजुट होकर अपनी पुश्तैनी जमीन न देने का फैसला लिया और सरकार की योजना के खिलाफ विरोध जताया।

ग्रामीणों का कहना है कि उनकी आजीविका, जंगल, खेती और सांस्कृतिक पहचान पूरी तरह इसी जमीन से जुड़ी है, इसलिए बिना उनकी सहमति के किसी भी तरह का निर्माण कार्य स्वीकार नहीं किया जाएगा।

आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए 14 जून को एक और बड़ी बैठक बुलाने का निर्णय लिया गया है, जिसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी। इसके बाद हितालकूडूम गांव में एक विशाल जनसभा करने की भी तैयारी है, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी और ग्रामीण शामिल होंगे।

संघर्ष समिति का कहना है कि सभी प्रभावित गांवों को एक मंच पर लाकर इस परियोजना के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया जाएगा। जानकारी के मुताबिक, इस प्रस्तावित बांध से दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर और नारायणपुर जिलों की 18 पंचायतों के करीब 56 गांव डूब क्षेत्र और विस्थापन से प्रभावित हो सकते हैं।

यह परियोजना इंद्रावती नदी पर बनने वाली है और इसका इतिहास 1970 के दशक से जुड़ा हुआ बताया जाता है। भारी विरोध और पर्यावरणीय नुकसान की आशंका के चलते यह योजना लंबे समय तक ठंडे बस्ते में रही थी।

अब राज्य सरकार इसे नए स्वरूप में लागू करने की तैयारी में है। सरकार का दावा है कि यह परियोजना बस्तर की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत कर आत्मनिर्भर बनाएगी।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस परियोजना से 125 मेगावाट बिजली उत्पादन, लगभग 4,824 टन मछली उत्पादन, और खरीफ-रबी सीजन में 3,78,475 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलने का लक्ष्य है। इसके अलावा 49 मिलियन घनमीटर पेयजल उपलब्ध कराने की योजना भी है।

साथ ही इंद्रावती-महानदी इंटरलिंकिंग प्रोजेक्ट के जरिए कांकेर जिले की 50 हजार हेक्टेयर सहित कुल 3 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा देने की योजना है।

हालांकि सरकार इसे विकास का बड़ा कदम बता रही है, लेकिन स्थानीय आदिवासियों के विरोध ने इस परियोजना को एक बार फिर बड़े विवाद में डाल दिया है।

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