अडानी के फायदे के लिए हसदेव में एक और कोयला खदान को मंजूरी देने की तैयारी की जा रही है।
केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (FAC) की बैठक में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को दिए गए और अदानी के एमडीओ वाले केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को वन स्वीकृति देने पर चर्चा हुई है। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार पहले ही इस प्रोजेक्ट के लिए अपनी सिफारिश केंद्र को भेज चुकी है।
इस नई खदान के चलते करीब 7 लाख पेड़ काटे जाने की बात कही जा रही है। इससे न सिर्फ घने जंगल, जमीन और जैव विविधता को नुकसान होगा, बल्कि हसदेव नदी और बांगो जलाशय पर भी बुरा असर पड़ेगा। पहले से ही हसदेव अरण्य में राजस्थान की दो खदानें परसा ईस्ट केते बासेन (PEKB) और परसा चल रही हैं, जिनसे करीब 10,630 एकड़ जंगल खत्म हो चुका है और लगभग 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं।
नहीं बचेगा हसदेव-बांगो जलाशय
भारतीय वन्य जीव संस्थान की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि खनन से हसदेव नदी और बांगो जलाशय प्रभावित होंगे, जिससे करीब 6 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई पर असर पड़ सकता है।
रामगढ़ पहाड़ पर भी खतरा
इस खदान को मंजूरी देने के लिए वन विभाग और जिला प्रशासन पर गलत और भ्रामक दस्तावेज देने के आरोप लग रहे हैं। ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले रामगढ़ पहाड़ की दूरी 9 किमी होने के बावजूद 11 किमी दिखाई गई। पहले से चल रहे खनन के कारण यहां दरारें भी आ चुकी हैं, और नई खदान से पूरा पहाड़ खतरे में पड़ सकता है।
आदिवासियों की जिंदगी पर असर
इस परियोजना का करीब 98% हिस्सा घने जंगल में है, जहां आसपास के गांवों के हजारों लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए निर्भर हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यहां के लोगों की लगभग 70% आय जंगल से ही आती है, जो इस खनन से प्रभावित होगी।
लेमरू हाथी रिजर्व पर असर
हसदेव अरण्य के करीब 1995 वर्ग किमी इलाके को हाथी रिजर्व घोषित किया गया है। प्रस्तावित खदान इस क्षेत्र से करीब 10 किमी के अंदर है। अगर यहां खनन हुआ, तो हाथियों का रास्ता बंद हो सकता है और मानव-हाथी संघर्ष बढ़ सकता है।
विधानसभा के फैसले के खिलाफ?
26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया था कि हसदेव के सभी कोल ब्लॉक रद्द किए जाएं। लेकिन मौजूदा सरकार इस फैसले के उलट जाकर इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही है।
पहले की सरकार ने किया था विरोध
पूर्व भूपेश बघेल सरकार ने इस कोल ब्लॉक की वन स्वीकृति और जमीन अधिग्रहण का विरोध किया था। यहां तक कि जनसुनवाई भी रद्द कर दी गई थी और केंद्र को आपत्ति भेजी गई थी। लेकिन अब मौजूदा सरकार ने उस फैसले को बदल दिया है।
बिजली जरूरत पर भी सवाल
राजस्थान की बिजली जरूरत पहले से कम हो चुकी है और वहां सोलर प्रोजेक्ट तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में नई खदान की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं।
हसदेव बचाओ आंदोलन और संघर्ष समिति ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि अगर इस इलाके में और खनन की अनुमति दी गई, तो इसका असर लंबे समय तक पर्यावरण और लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा। हसदेव में खनन की अनुमति अब छत्तीसगढ़ के लिए विनाशकारी कदम होगा।



