रायपुर।छत्तीसगढ़ में डामर की कीमतों में वृद्धि का हवाला देकर सड़क निर्माण और नवीनीकरण के कार्य प्रभावित होने की खबरों ने लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेशभर में हजारों करोड़ रुपये के निर्माण कार्य प्रभावित होने के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत टेंडर जारी करने, दरें स्वीकृत करने और अनुबंध करने के बाद यदि ठेकेदार काम रोक देते हैं, तो संबंधित विभागीय अधिकारी उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं?
बिलासपुर में करीब 177.73 करोड़ रुपये की लागत वाली 12 सड़क परियोजनाओं के प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है। वहीं रायपुर, महासमुंद और भिलाई में भी सड़क निर्माण एवं डामरीकरण के काम रुकने की खबरें हैं। यदि इन परियोजनाओं में ठेकेदार अनुबंध के अनुसार काम करने के लिए बाध्य हैं, तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि अब तक कितने ठेकेदारों को नोटिस जारी किए गए, कितने अनुबंधों की समीक्षा हुई और कितने मामलों में दंडात्मक कार्रवाई की गई।
टेंडर के समय दर स्वीकार, अब महंगाई का हवाला क्यों?
सरकारी निर्माण कार्यों में ठेकेदार निविदा प्रक्रिया के तहत निर्धारित शर्तों के आधार पर दरें प्रस्तुत करते हैं। यदि अनुबंध पूरा होने के बाद बाजार में डामर की कीमत बढ़ जाती है, तो यह देखना आवश्यक है कि संबंधित एग्रीमेंट में मूल्य समायोजन का प्रावधान है या नहीं। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या बाजार भाव बढ़ने पर ही ठेकेदारों को राहत देने की मांग उठती है? कीमतें घटने पर क्या इसी तरह सरकार को वित्तीय लाभ पहुंचाने के लिए अनुबंध दरों में कमी की जाती है?
यदि किसी अनुबंध में मूल्य वृद्धि की भरपाई का प्रावधान नहीं है, तो केवल बाजार भाव बढ़ने के आधार पर अतिरिक्त भुगतान की मांग को स्वीकार करने का औचित्य क्या होगा? और यदि ऐसा प्रावधान मौजूद है, तो विभाग को उसके अनुसार पारदर्शी तरीके से भुगतान का हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए।
अधिकारियों की मिलीभगत
इस पूरे मामले में संबंधित विभागीय अधिकारियों की भूमिका की जांच जरूरी है। टेंडर जारी करने से लेकर अनुबंध की निगरानी और काम पूरा कराने तक विभाग की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में यदि ठेकेदार काम रोक देते हैं और परियोजनाएं समयसीमा से पीछे चली जाती हैं, तो जवाबदेही केवल ठेकेदारों तक सीमित नहीं रह सकती।
क्या संबंधित अधिकारियों ने काम रोकने वाले ठेकेदारों को कारण बताओ नोटिस जारी किए? क्या अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन की जांच की गई? क्या देरी के लिए जिम्मेदारी तय की गई? क्या विभाग ने अनुबंध में उपलब्ध जुर्माने, परफॉर्मेंस सिक्योरिटी या अन्य प्रावधानों के तहत कार्रवाई पर विचार किया?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि ठेकेदारों की मांग को बिना अनुबंधीय परीक्षण के आगे बढ़ाया जाता है, तो क्या इससे सरकारी धन पर अनावश्यक बोझ पड़ सकता है? शासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी संशोधन के पीछे स्पष्ट नियम, तकनीकी आधार और वित्तीय औचित्य मौजूद हो।
काम रोकने वाले ठेकेदारों पर ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई क्यों नहीं?
यदि कोई ठेकेदार बिना वैध कारण और अनुबंधीय अनुमति के काम रोकता है, तो संबंधित विभाग को केवल पत्राचार तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पहले ठेकेदार से जवाब मांगा जाना चाहिए, अनुबंध की शर्तों और उपलब्ध तथ्यों की जांच होनी चाहिए तथा उल्लंघन साबित होने पर नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
गंभीर या बार-बार अनुबंध उल्लंघन के मामलों में, लागू नियमों के तहत अनुबंध समाप्त करने, सुरक्षा राशि जब्त करने या ब्लैकलिस्टिंग जैसी कार्रवाई पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि, ऐसी कार्रवाई उचित प्रक्रिया, सुनवाई के अवसर और अनुबंध की संबंधित शर्तों के अनुरूप ही होनी चाहिए।
शासन को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रभावित परियोजनाओं में अब तक क्या कार्रवाई हुई है और यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो इसके पीछे क्या कारण हैं। आखिरकार, सार्वजनिक धन से बनने वाली सड़कों का समय पर निर्माण सुनिश्चित करना विभाग की जिम्मेदारी है। ठेकेदारों और अधिकारियों- दोनों की जवाबदेही तय किए बिना समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
शासन के सामने पांच बड़े सवाल
- डामर की कीमत बढ़ने के बाद काम रोकने वाले ठेकेदारों को अब तक कितने नोटिस जारी किए गए?
- किन अनुबंधों में मूल्य समायोजन का प्रावधान है और किनमें नहीं? क्या इसका परियोजनावार विवरण सार्वजनिक किया जाएगा?
- क्या बिना अनुबंधीय आधार के किसी ठेकेदार को अतिरिक्त भुगतान या संशोधित दर का लाभ दिया गया है?
- करोड़ों रुपये की परियोजनाएं प्रभावित होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही क्यों नहीं तय की गई?
यदि जांच में अनुबंध उल्लंघन साबित होता है, तो क्या संबंधित ठेकेदारों के विरुद्ध नियमानुसार अनुबंध निरस्तीकरण और ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई की जाएगी?
सार्वजनिक धन की सुरक्षा और समय पर निर्माण कार्य पूरा कराना शासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। डामर की कीमतों में वृद्धि वास्तविक समस्या हो सकती है, लेकिन यह अपने आप अनुबंध की शर्तों से छूट का आधार नहीं बनती। जरूरत इस बात की है कि शासन पूरे मामले की परियोजनावार जांच कराए, विभागीय अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट करे और नियमों का उल्लंघन करने वाले ठेकेदारों के विरुद्ध कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक करे।






