छत्तीसगढ़ महतारी की कोख से कोयला, लोहा और बेशकीमती खनिज लगातार निकाले जा रहे हैं। खदानों से अरबों-खरबों की कमाई हो रही है, लेकिन जिन आदिवासियों और ग्रामीणों की जमीन, जंगल, पानी और हवा इस खनन की कीमत चुका रहे हैं, उनके हिस्से में अब भी धूल, धुआं, सूखी नदियां और अधूरे वादे हैं।
इसी सवाल का जवाब तलाशने वाली CAG की रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ के DMF फंड की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक राज्य के 33 जिलों में DMF के तहत 13,101.65 करोड़ रुपये जमा हुए। यह पैसा उन लोगों के लिए था जिनकी जमीन से खनिज निकला, जिनके गांव खदानों से प्रभावित हुए और जिनकी जिंदगी प्रदूषण तथा विस्थापन से बदली।
लेकिन सवाल यह है कि इस पैसे का कितना हिस्सा वास्तव में उन लोगों तक पहुंचा?
पहले पैसा बंटा, बाद में प्रभावित खोजे गए
नियम साफ था—सबसे पहले यह तय होना था कि खनन से प्रभावित क्षेत्र कौन-सा है और प्रभावित लोग कौन हैं। लेकिन CAG की रिपोर्ट के मुताबिक प्रभावितों की पहचान करने में 5 महीने से लेकर 65 महीने तक की देरी की गई।
हैरानी की बात यह है कि प्रभावितों की पहचान पूरी होने से पहले ही 160 करोड़ रुपये के काम मंजूर कर दिए गए। यानी पहले पैसा बांट दिया गया और बाद में कागजों पर यह तय किया गया कि असली प्रभावित कौन था।
CAG ने 11 सैंपल जिलों के 1,734 सीधे प्रभावित गांवों की जांच की। इनमें 754 गांव यानी करीब 44 प्रतिशत गांवों में DMF की एक भी राशि खर्च नहीं हुई। जिन गांवों की जमीन और जिंदगी खनन की मार झेल रही थी, वे गांव पानी, सड़क और इलाज जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते रहे।
79 प्रतिशत पैसा बिना बजट के खर्च
नियम कहता है कि हर साल DMF की वार्षिक कार्ययोजना और बजट बनना चाहिए। लेकिन 12 सैंपल जिलों में जमा 6,150 करोड़ रुपये में से 4,870 करोड़ रुपये यानी 79 प्रतिशत से अधिक रकम बिना मंजूर वार्षिक बजट के खर्च कर दी गई।
अब जरा सोचिए—जिस पैसे का हिसाब पहले से तय होना चाहिए था, वह बिना बजट के कैसे खर्च हो गया? किसके आदेश पर खर्च हुआ? किसकी निगरानी में खर्च हुआ? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह पैसा वास्तव में खनन प्रभावितों पर खर्च हुआ?
गांवों की प्यास के पैसे से दफ्तरों की चमक
प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना का नियम था कि कम से कम 60 प्रतिशत राशि पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण जैसे जरूरी कामों पर खर्च की जाए। लेकिन छत्तीसगढ़ में 30.73 करोड़ रुपये ऐसे कामों पर खर्च किए गए जिनका खनन प्रभावित लोगों से दूर-दूर तक कोई सीधा संबंध नहीं था।
कहीं कलेक्टर और एसपी कार्यालयों का सौंदर्यीकरण हुआ, कहीं महंगे फर्नीचर खरीदे गए, कहीं लग्जरी गाड़ियां और पुलिस गैजेट्स आए। स्वागत द्वार बनाए गए, दफ्तरों में चमचमाती लाइटिंग लगाई गई।
जिस पैसे से खदान के पास रहने वाले गांवों में पानी पहुंचना था, उसी पैसे से साहबों के दफ्तर सजते रहे।
करोड़ों खर्च, लेकिन प्रोजेक्ट बेकार
CAG ने 42 करोड़ रुपये से ज्यादा के प्रोजेक्ट्स को निष्फल और अनुपयोगी बताया है। कोरबा में 10 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत से बनी मल्टीलेवल पार्किंग धूल फांक रही है।
दंतेवाड़ा और बीजापुर में 1.15 करोड़ रुपये की लागत से बनाए गए बायोगैस प्लांट गोबर की व्यवस्था नहीं होने के कारण बंद पड़े हैं। कई जगह आंगनबाड़ी, लाइब्रेरी और मार्केट शेड बनाए गए, लेकिन निर्माण के बाद वे ताले में बंद मिले।
यानी पैसा खर्च हुआ, कागजों में काम पूरा हुआ, लेकिन जनता के हिस्से में सुविधा नहीं आई।
वितरण के नाम पर भी सवाल
मुफ्त वितरण के नाम पर करीब 78 करोड़ रुपये बांटे गए। साइकिल, सिलाई मशीन और कृषि सामग्री के वितरण से जुड़े 30 मामलों में CAG ने 27.09 करोड़ रुपये की जांच की।
जांच में कई जगह न ग्रामसभा की अनुशंसा मिली, न आय प्रमाण-पत्र और न ही यह सत्यापन कि लाभ पाने वाला व्यक्ति वास्तव में खनन प्रभावित क्षेत्र से है। कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति को दो-दो बार सामान दिए जाने की बात सामने आई।
अब सवाल यह है कि जब पात्रता की जांच ही नहीं हुई तो सामग्री किस आधार पर बांटी गई? और यदि एक ही व्यक्ति को दो बार लाभ मिला, तो क्या यह महज गलती थी या व्यवस्था की मिलीभगत?
खरीद में टेंडर और नियम गायब
खरीद प्रक्रिया में भी नियमों की अनदेखी सामने आई। 17.49 करोड़ रुपये की खरीद बिना खुले टेंडर के सीमित कोटेशन के आधार पर कर ली गई।
वहीं 38.82 करोड़ रुपये की खरीद में तकनीकी स्पेसिफिकेशन तक तय नहीं किए गए। यानी सामान क्या चाहिए, किस गुणवत्ता का चाहिए और किस आधार पर खरीदा जाएगा—इन सवालों का स्पष्ट जवाब ही नहीं था।
जब नियमों के बजाय मनमर्जी से खरीद होगी, तो फायदा किसे मिलेगा—प्रभावित गांवों को या ठेकेदारों और बिचौलियों को?
निगरानी समितियां भी सोती रहीं
जिस फंड की निगरानी के लिए समितियां बनाई गई थीं, उनकी स्थिति भी बेहद खराब रही। राज्य स्तरीय निगरानी समिति की नौ बैठकों में केवल तीन बैठकें हुईं।
समीक्षा समिति की 36 निर्धारित बैठकों में सिर्फ दो बैठकें हुईं। नवंबर 2022 के बाद दोनों समितियों की कोई बैठक नहीं हुई। यानी 13 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि पर निगरानी के लिए बनी समितियां ही नियमित रूप से नहीं बैठीं।
12 जिलों में वर्ष 2015 से अब तक एक भी सोशल ऑडिट नहीं हुआ। जिन लोगों के नाम पर पैसा खर्च किया गया, उनसे कभी पूछा ही नहीं गया कि काम हुआ या नहीं हुआ।
जनता के हक का पैसा
CAG की रिपोर्ट यह नहीं कहती कि हर रुपया लूट लिया गया। लेकिन रिपोर्ट यह जरूर दिखाती है कि नियम टूटे, प्रभावितों की पहचान में देरी हुई, बिना बजट के पैसा खर्च हुआ, कई गांव खाली हाथ रहे, अनुपयोगी प्रोजेक्ट बने और निगरानी समितियां निष्क्रिय रहीं।
छत्तीसगढ़ की जमीन के नीचे खनिजों का भंडार है। लेकिन अगर उस दौलत के ऊपर बैठे लोग भूखे, प्यासे और बीमार रहें, तो खनिज संपदा पर गर्व किस काम का?
यह पैसा किसी अफसर, नेता, ठेकेदार या विभाग की जागीर नहीं है। यह उस आदिवासी का हक है जिसकी जमीन से कोयला निकला। यह उस बच्चे का हक है जिसका स्कूल खदान के पास है। यह उस मां का हक है जिसका कुआं सूख गया।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पैसा कहां खर्च हुआ। सवाल यह है कि प्रभावित लोगों का हक किसने रोका, किसकी निगरानी में रोका और अब इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? CAG की रिपोर्ट ने फाइल खोल दी है। अब जरूरत है कि जिले-दर-जिले इस पूरे हिसाब का जवाब जनता के सामने रखा जाए





