बस्तर से शुरू हुई पारंपरिक ज्ञान की खोज, वैद्यों और ग्रामीणों से जानकारी जुटा रही वैज्ञानिकों की टीम

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ की समृद्ध जैव विविधता और सदियों पुराने पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने की दिशा में राज्य सरकार ने महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन और वन मंत्री केदार कश्यप के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड द्वारा राज्य में एक व्यापक शोध अध्ययन संचालित किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य स्थानीय समुदायों द्वारा पौधों और जड़ी-बूटियों के पारंपरिक उपयोग को वैज्ञानिक तरीके से समझना, उसका दस्तावेजीकरण करना और आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना है।

‘Ethnobotany of Chhattisgarh’ के तहत हो रहा अध्ययन

‘Ethnobotanical Investigation of Plants Used by Local Communities in Chhattisgarh / Ethnobotany of Chhattisgarh’ नाम से चलाए जा रहे इस शोध अभियान में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का अध्ययन किया जा रहा है। खासतौर पर औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों और पेड़-पौधों के स्थानीय उपयोग को समझने पर जोर दिया जा रहा है।

शोध परियोजना के प्रथम चरण में विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की टीम ने बस्तर संभाग का दौरा किया। टीम में डॉ. के. रवि कुमार, एमेरिटस प्रोफेसर, टी.डी.यू. बेंगलुरु, डॉ. अब्दुल करीम, प्रोफेसर, टी.डी.यू. बेंगलुरु और डॉ. देवयानी शर्मा, जनजातीय औषधि विशेषज्ञ शामिल रहे।

पौधों से जुड़ी जीवनशैली और संस्कृति का अध्ययन

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने यह जानने का प्रयास किया कि स्थानीय समुदायों के दैनिक जीवन में पेड़-पौधों की क्या भूमिका है। इसके साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं, विभिन्न त्योहारों, रीति-रिवाजों और मानव जीवन चक्र के अलग-अलग चरणों में पौधों के उपयोग को भी समझा जा रहा है।

इसके अलावा स्थानीय अर्थव्यवस्था में जंगल और पौधों से मिलने वाले संसाधनों के योगदान का भी अध्ययन किया जा रहा है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि पारंपरिक ज्ञान केवल स्वास्थ्य और औषधीय उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय जीवनशैली और आजीविका से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

बीजापुर के सुदूर इलाकों में जंगलों तक पहुंची वैज्ञानिकों की टीम

शोध के प्रथम चरण में टीम ने बस्तर संभाग के सुदूर और संवेदनशील क्षेत्र बीजापुर जिले का विस्तृत दौरा किया। वैज्ञानिकों ने भोपालपटनम, उसूर, भैरमगढ़ और बीजापुर क्षेत्रों में पारंपरिक वैद्यों से मुलाकात की और उनके द्वारा उपयोग की जाने वाली जड़ी-बूटियों तथा औषधीय पौधों की जानकारी जुटाई।

पौधों की पहचान और उनके पारंपरिक उपयोग को बेहतर ढंग से समझने के लिए विशेषज्ञों ने वैद्यों के साथ जंगलों में जाकर भ्रमण भी किया। इस दौरान स्थानीय स्तर पर उपयोग में लाई जाने वाली विभिन्न वनस्पतियों से जुड़ी जानकारी एकत्र की गई।

दंतेवाड़ा से कांकेर तक जुटाई जानकारी

बीजापुर के बाद शोध दल ने दंतेवाड़ा, बस्तर, कोंडागांव और कांकेर जिलों का भी दौरा किया। टीम ने स्थानीय ग्रामीणों और पारंपरिक वैद्यों से मुलाकात कर उनके अनुभवों और पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान को समझने का प्रयास किया।

वैज्ञानिकों ने ग्रामीणों के घरों, दैनिक जीवन और सांस्कृतिक परंपराओं को करीब से देखा। इस दौरान पौधों के उपयोग, उनके स्थानीय नाम, औषधीय महत्व और पारंपरिक उपचार पद्धतियों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई गईं।

अन्य संभागों तक बढ़ाया जाएगा शोध का दायरा

प्रथम चरण में बस्तर संभाग के प्रमुख क्षेत्रों से जुटाए गए आंकड़ों और पारंपरिक ज्ञान को शोध के लिए आधार बनाया गया है। आगामी चरणों में इस अध्ययन को छत्तीसगढ़ के अन्य संभागों तक विस्तार देने की योजना है।

इस शोध के माध्यम से राज्य के पारंपरिक ज्ञान को व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकृत और संरक्षित करने में मदद मिलेगी। साथ ही स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, जैव विविधता और औषधीय वनस्पतियों के बीच संबंधों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का रास्ता भी मजबूत होगा।

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