दुर्ग में एक सरकारी कार्यक्रम के बाद शुरू हुआ विवाद अब काफी बढ़ गया है। आरोप है कि नगर निगम महापौर अलका बाघमार ने तीन अफसरों को अपने केबिन में रोक लिया और उन्हें बाहर नहीं जाने दिया, जिस पर मामला इतना बिगड़ गया कि पुलिस को दखल देना पड़ा।
भूमिपूजन कार्यक्रम से शुरू हुआ विवाद
पूरा मामला उरला इलाके के एक सरकारी स्कूल में अतिरिक्त कक्षा के भूमिपूजन कार्यक्रम से शुरू हुआ। कार्यक्रम में मंत्री गजेंद्र यादव मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। बताया जा रहा है कि जब महापौर मौके पर पहुंचीं, तब तक भूमिपूजन शुरू हो चुकी थी। इसी बात पर वे नाराज़ हो गईं और मंच पर ही अफसरों पर लापरवाही का आरोप लगा दिया।
महापौर ने मंच से ही कहा कि अगर काम ठीक से नहीं करना है तो वेतन लेने का भी हक नहीं है। इस बात के बाद कार्यक्रम का माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया।
अगले दिन निगम कार्यालय में बढ़ा मामला
इसके बाद अगले दिन महापौर ने ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के ईई जे.के. मेश्राम, एसडीओ सी.के. सोने और मंडी बोर्ड के एसडीओ प्रवीण पांडे को नगर निगम दफ्तर में बुलाया। उनसे कार्यक्रम में हुई कथित लापरवाही पर जवाब मांगा गया।
आरोप है कि बातचीत के दौरान जब जवाब संतोषजनक नहीं मिला तो माहौल गरम हो गया। कहा जा रहा है कि महापौर ने सख्त लहजे में कहा कि जब तक सही जवाब नहीं मिलेगा, तब तक कोई बाहर नहीं जाएगा। इसी दौरान गार्ड को भी निर्देश दिए गए कि किसी को बाहर न जाने दिया जाए।
अफसरों ने पुलिस को दी सूचना
बताया जा रहा है कि अंदर मौजूद एक अधिकारी ने किसी तरह पुलिस को सूचना दे दी। इसके बाद एएसपी, सीएसपी और दो थानों की पुलिस टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने दखल देकर अफसरों को वहां से बाहर निकाला।इस घटना के बाद नगर निगम दफ्तर में काफी हंगामा और चर्चा का माहौल बन गया।
महापौर ने दी सफाई
वहीं महापौर अलका बाघमार ने आरोपों को गलत बताया है। उनका कहना है कि किसी को बंधक नहीं बनाया गया था, सिर्फ जवाब मांगा जा रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारियों ने खुद मामले को बढ़ाया है और इसे राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
इस पूरे मामले ने दुर्ग में हलचल मचा दी है और इसे “अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव” के रूप में देखा जा रहा हैं।



