डीएमएफ फंड में भारी लूट! पहले बनाए लाखों का तालाब, फिर उसी को पाट रहे

Madhya Bharat Desk
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दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ में विकास योजनाओं के नाम पर सरकारी पैसों की बर्बादी आम बात हो गई है। अब मामला बस्तर के बचेली क्षेत्र से आया है, जहां करीब आधा करोड़ रुपए खर्च कर बनाए गए तालाब को अब खुद प्रशासन मिट्टी और मलबे से भरवा रहा है और वजह बता रहे है कि पास में मौजूद एनएमडीसी के टेलिंग डैम में दरारें आ गई हैं और तालाब में पानी भरने से डैम पर दबाव बढ़ सकता है।

हैरानी की बात यह है कि जिस जगह तालाब बनाया गया, उसके ठीक ऊपर पहले से जहरीली लाल मिट्टी (टेलिंग) से भरा बांध बना हुआ है जो करीब 50 साल पुराना है। अब सवाल उठ रहा है कि जब तालाब बनाया गया था, तब क्या अधिकारियों को इस खतरे की जानकारी नहीं थी?

करीब पांच साल पहले वन विभाग ने डीएमएफ (जिला खनिज संस्थान न्यास) मद से इस तालाब का निर्माण कराया था। लगभग 8 हजार वर्गमीटर में फैला यह तालाब बारिश के मौसम में पूरी तरह भर जाता था और आसपास के लोगों व मवेशियों के लिए पानी का प्रमुख स्रोत बन चुका था। लेकिन अब उसी तालाब को खत्म करने की तैयारी चल रही है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, तालाब को पाटने के लिए एनएमडीसी ने टेंडर भी जारी कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह पूरी कार्रवाई बिना वन विभाग की अनुमति के शुरू कर दी गई जबकि तालाब रिजर्व फॉरेस्ट की जमीन पर बना है, इसलिए किसी भी बदलाव के लिए वन विभाग की मंजूरी जरूरी थी। वन विभाग के अधिकारियों ने भी स्वीकार किया है कि उन्हें इस काम की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई थी।

इस पूरे मामले ने प्रशासनिक समन्वय और जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि अगर डैम कमजोर हो चुका है तो उसकी मरम्मत और मजबूती पर काम होना चाहिए था, न कि करोड़ों की योजनाओं को मिट्टी में मिलाया जाए।

लोगों को यह भी डर है कि कहीं डैम टूटा तो 2024 के किरंदुल हादसे जैसे हाल न हो जाए, जिसमें एनएमडीसी का टेलिंग डैम टूटने से भारी तबाही हुई थी। जहरीला लाल मलबा सैकड़ों घरों में घुस गया था और ग्रामीणों को भारी नुकसान झेलना पड़ा था।

लोगो का मानना है कि अगर टेलिंग डैम कमजोर है तो उसकी संरचना को मजबूत करना जरूरी है नहीं तो भारी बारिश के दौरान डैम टूटने की स्थिति में लाखों टन जहरीला लाल कीचड़ बस्तियों और जल स्रोतों तक पहुंच सकता है, जिससे जमीन बंजर होने और पानी प्रदूषित होने का खतरा बढ़ जाएगा।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर 49 लाख रुपए खर्च करने के बाद इस योजना को विफल मानने की जिम्मेदारी कौन लेगा? और क्या जनता के पैसों की इस बर्बादी के लिए किसी अफसर या एजेंसी पर कार्रवाई होगी?

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