रायपुर। न्याय की राह कभी-कभी लंबी जरूर होती है, लेकिन उसका अंत अक्सर कई सवाल भी छोड़ जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ रायपुर के चर्चित 2013 गोलीकांड मामले में, जहां करीब 13 साल बाद अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए आरोपी वीरेंद्र सिंह उर्फ रुबी सिंह तोमर को बरी कर दिया।
प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश नीरज शर्मा की अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। अदालत ने पाया कि मामले में पेश किए गए सबूत पर्याप्त मजबूत नहीं थे और गवाहों के बयान भी समय के साथ कमजोर पड़ गए। इसी आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया गया।
यह फैसला न सिर्फ आरोपी के लिए बड़ी राहत लेकर आया, बल्कि यह भी दिखाता है कि किसी भी आपराधिक मामले में ठोस साक्ष्य और मजबूत गवाही कितनी अहम होती है।
क्या था पूरा मामला?
13 अगस्त 2013 की दोपहर, एक साधारण विवाद ने अचानक हिंसक रूप ले लिया। हबीब खान अपने कुछ साथियों के साथ चौरासिया कॉलोनी पहुंचे थे। उनका मकसद था बकाया रकम नहीं मिलने पर अपना फर्नीचर वापस लेना।
मामूली कहासुनी ने देखते ही देखते झगड़े का रूप ले लिया। आरोप के मुताबिक, इसी दौरान वीरेंद्र सिंह तोमर ने पिस्तौल निकालकर हबीब खान पर गोली चला दी, लेकिन वह उन्हें नहीं लगी।
इसके बाद स्थिति और बिगड़ गई। आरोपी ने हबीब के पीछे खड़े नौशाद आलम उर्फ असलम को हबीब का साथी समझ लिया और उन पर गोली चला दी। यह गोली सीधे लगी और नौशाद की मौके पर ही मौत हो गई।
क्यों कमजोर पड़ा केस?
- गवाहों के बयान समय के साथ बदलते और कमजोर होते गए
- घटनास्थल से मिले साक्ष्य निर्णायक साबित नहीं हो सके
- अभियोजन पक्ष आरोपी की संलिप्तता को पुख्ता तरीके से स्थापित नहीं कर पाया
इन सभी कारणों के चलते अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराने के बजाय संदेह का लाभ देना उचित समझा।



