रायपुर में 10 दिनों तक चले खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 का समापन हो चुका है, लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ की रैंकिंग ने जश्न से ज्यादा सवाल खड़े कर दिए हैं। मेजबान होने के बावजूद राज्य 19 मेडल (3 गोल्ड, 10 सिल्वर, 6 ब्रॉन्ज) के साथ 9वें स्थान पर रहा।
यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि खेल व्यवस्था की हकीकत को सामने लाता है।
एक तरफ कर्नाटक 23 गोल्ड के साथ ओवरऑल चैंपियन बना, तो वहीं ओडिशा और झारखंड जैसे राज्य—जिनकी परिस्थितियां छत्तीसगढ़ से काफी मिलती-जुलती हैं—दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। इससे साफ होता है कि समस्या प्रतिभा की नहीं, बल्कि उसे सही दिशा और संसाधन देने की है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने समापन समारोह में खिलाड़ियों के लिए नकद इनामों की घोषणा की। व्यक्तिगत स्पर्धाओं में गोल्ड पर 2 लाख, सिल्वर पर 1.5 लाख और ब्रॉन्ज पर 1 लाख रुपए देने की बात कही गई। वहीं टीम इवेंट्स में भी अलग-अलग पुरस्कार तय किए गए हैं।
लेकिन असली सवाल यही है—क्या सिर्फ इनामों से खिलाड़ी तैयार हो सकते हैं?
ग्राउंड लेवल पर तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है। आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में टैलेंट की कोई कमी नहीं है, लेकिन वहां न तो पर्याप्त कोचिंग सुविधाएं हैं, न ही आधुनिक ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर। कई खिलाड़ी अपने खर्चे पर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने को मजबूर हैं।

झारखंड और ओडिशा की सफलता यह दिखाती है कि जब योजनाएं कागज से निकलकर जमीन पर उतरती हैं, तब नतीजे भी बेहतर आते हैं। वहीं छत्तीसगढ़ में कई योजनाएं अभी भी फाइलों तक सीमित नजर आती हैं।
अब वक्त है आत्ममंथन का। क्या खेल सिर्फ इवेंट और घोषणाओं तक ही सीमित रहेंगे, या उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य की तरह प्राथमिकता मिलेगी?
अगर सिस्टम नहीं बदला, तो मेडल टेबल में भी बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल ही रहेगा।



