छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार के ‘सुशासन’ के दो साल पूरा होते-होते हर तरफ जमीन पर उगती अफीम की फसलों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए है। हाल के दिनों में राज्य के अलग-अलग जिलों से अवैध अफीम की खेती के लगातार मामले सामने आ रहे हैं, जो सरकार के दावों पर तंज कसते नजर आ रहे हैं।
पिछले करीब 15 दिनों के भीतर दुर्ग, बलरामपुर और रायगढ़ जैसे जिलों में अफीम की खेती का खुलासा हुआ है। दुर्ग में एक बीजेपी नेता के फार्महाउस पर डेढ़ एकड़ से ज्यादा जमीन में अफीम उगाई जा रही थी। मामला सामने आते ही पार्टी ने कार्रवाई करते हुए नेता को निलंबित कर दिया, लेकिन सवाल यही है कि इतनी बड़ी खेती आखिर कब से चल रही थी?
वहीं बलरामपुर जिले के तुर्रीपनी और चंदाडांडी गांवों में भी 2 से 3 एकड़ तक अफीम की फसलें लहलहाती मिलीं। यह कोई छोटी-मोटी खेती नहीं, बल्कि संगठित स्तर पर चल रहे अवैध कारोबार की तरफ इशारा करती है।
सबसे चौंकाने वाला मामला रायगढ़ जिले के आमाघाट से सामने आया, जहां तरबूज की फसल के बीच छुपाकर करीब 60 हजार अफीम के पौधे उगाए गए थे। यहां से करीब 3 किलो तैयार अफीम भी बरामद हुई, जिसकी कीमत लगभग 2 करोड़ रुपये आंकी गई है। जांच में यह भी सामने आया कि इस नेटवर्क में बाहरी राज्यों, खासकर झारखंड से आए लोग भी शामिल हो सकते हैं।
इन लगातार खुलासों ने राज्य की कानून-व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस अब ड्रोन सर्विलांस और विशेष अभियान चला रही है, लेकिन यह कार्रवाई तब शुरू हुई जब मामले सामने आने लगे।

इसी बीच, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरकार के ‘सुशासन’ की उपलब्धियां गिना रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर हमलावर है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तंज कसते हुए कहा कि “सूखा नशा ही सुशासन है”, और आरोप लगाया कि राज्य को अफीम का ‘उड़ता पंजाब’ बनाने की दिशा में धकेला जा रहा है।
एक तरफ सरकार विकास और पारदर्शिता की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ अफीम जैसी अवैध खेती का फैलता जाल यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या वाकई ‘सुशासन’ ज़मीन तक पहुंच पाया है, या फिर यह सिर्फ कागजों तक सीमित है।
छत्तीसगढ़ के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या समय रहते इस बढ़ते नशे के नेटवर्क पर लगाम लगेगी, या फिर यह राज्य भी ‘उड़ता पंजाब’ जैसी पहचान की ओर बढ़ता चला जाएगा?



