रक्षा मंत्रालय के हालिया ट्वीट ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया है। मंत्रालय ने घोषणा की है कि नए सैनिक स्कूलों को खोलने के लिए निजी कंपनियों और संस्थाओं को प्रोत्साहित किया जाएगा। इस फैसले पर विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तीखा विरोध जताया है, इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़’ करार देते हुए।
सैनिक स्कूल, जो सेना के भावी सिपाहियों को तैयार करने के लिए जाने जाते हैं, अब निजी हाथों में सौंपे जाने की कगार पर हैं। आलोचकों का कहना है कि यह कदम शिक्षा को ‘धंधा’ बनाने की दिशा में एक और खतरनाक कदम है।
एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “देश का दुर्भाग्य है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं व्यवसाय बन चुकी हैं। प्राइवेट स्कूल और अस्पताल तो अब सबसे बड़े कारोबार हैं। क्या सरकार के पास बजट की कमी है या अपने मित्रों को लाभ पहुंचाने का इरादा है?”
रक्षा मंत्रालय का तर्क है कि निजी भागीदारी से स्कूलों का विस्तार तेज होगा और गुणवत्ता सुधरेगी। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे फीस बढ़ेगी, गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों का रास्ता बंद हो जाएगा।
पूर्व सैनिक नेता रिटायर्ड कर्नल अजय सिंह ने चेतावनी दी, “ऐसे ही चला तो सब कुछ प्राइवेट और चुनिंदा पूंजीपतियों के हाथों में चला जाएगा। यह देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए घातक साबित होगा।”
विपक्षी दलों ने संसद में इस मुद्दे को उठाने का ऐलान किया है। क्या यह निजीकरण सैनिक स्कूलों की आत्मा को बेचने जैसा है? या विकास का नया मॉडल? बहस तेज हो गई है।



