बिहार, ओडिशा और हरियाणा में राज्यसभा चुनाव के दौरान सामने आई क्रॉस वोटिंग की घटनाओं ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है। अब नजरें मध्यप्रदेश पर टिकी हैं, जहां जून में होने वाले राज्यसभा चुनाव पार्टी के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकते हैं।
मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के लिए यह चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं माना जा रहा। उन्हें पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को यह साबित करना होगा कि प्रदेश संगठन पर उनकी पकड़ कितनी मजबूत है।
हाल ही में देश के कई राज्यों में हुए राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस को झटका लगा। खासकर बिहार, ओडिशा और हरियाणा में पार्टी के विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग किए जाने से संगठन की एकजुटता पर सवाल खड़े हुए हैं। ओडिशा में तो पार्टी के दो विधायक, जो जिला अध्यक्ष भी हैं, उन्होंने ही पार्टी लाइन से अलग जाकर वोटिंग की जिससे नेतृत्व के फैसलों पर भी सवाल उठ रहे हैं।
ऐसे में कांग्रेस का केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व मध्यप्रदेश में किसी भी तरह की टूट-फूट से बचने के लिए पहले से सतर्क नजर आ रहा है। माना जा रहा है कि विधायकों के साथ लगातार संवाद और रणनीतिक बैठकें अब तेज होंगी, ताकि किसी भी संभावित भितरघात को रोका जा सके।
मध्यप्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव होना है। मौजूदा संख्या बल के हिसाब से दो सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में जाना लगभग तय है, जबकि तीसरी सीट कांग्रेस के पास जाने की उम्मीद है। लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए संभावना जताई जा रही है कि भाजपा तीसरी सीट पर भी उम्मीदवार उतार सकती है, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो जाएगा।
विधानसभा चुनाव 2023 में कांग्रेस ने 66 सीटें जीती थीं, लेकिन बाद में कुछ विधायकों के पाला बदलने और उपचुनाव के नतीजों के बाद पार्टी की संख्या घटकर करीब 64 रह गई है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। राज्यसभा चुनाव इस बात को साफ कर सकते हैं कि ये अटकलें कितनी सच हैं।
ऐसे में मध्यप्रदेश का यह चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि पार्टी की एकजुटता और नेतृत्व की विश्वसनीयता की भी परीक्षा बन गया है।







