500 करोड़ रुपये के कथित मुआवजा विवाद में नाम आने के बाद जिनका IAS अवॉर्ड रुका, जिन्होंने निलंबन झेला और जिन पर गंभीर आरोप लगे — वही अधिकारी तीर्थराज अग्रवाल आज फिर प्रभावशाली पद पर कायम हैं। ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है: क्या यही है सुशासन?
विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली सरकार पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है, लेकिन हालिया प्रशासनिक फैसले ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।
पूरा मामला
यह विवाद तीर्थराज अग्रवाल से जुड़ा है जिन पर वर्ष 2014 में जमीन अधिग्रहण मुआवजे में लगभग 500 करोड़ रुपये की अनियमितता के आरोप लगे थे। मामला इतना गंभीर था कि जांच रिपोर्ट तैयार हुई, निलंबन हुआ और फाइलें वर्षों तक चलती रहीं।
अब एक सरकारी आदेश के जरिए केस समाप्त किए जाने की बात कही गई है, लेकिन आदेश में यह स्पष्ट नहीं है कि जांच में उन्हें पूर्ण रूप से दोषमुक्त पाया गया या नहीं। यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू होता है।
राजनीतिक समीकरण और घिरती सरकार
मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि संबंधित अधिकारी तीर्थराज अग्रवाल का पारिवारिक संबंध राज्य के पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल से जोड़ा जाता है। विपक्ष इसे हितों के टकराव के रूप में देख रहा है और आरोप लगा रहा है कि क्या राजनीतिक संरक्षण के कारण उन्हें फिर से प्रभावशाली पद मिला?

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार “सुशासन” को अपना मूल मंत्र बताती रही है। ऐसे में विपक्षी दल और राजनीतिक विश्लेषक पूछ रहे हैं:
- अगर जांच में अधिकारी पूरी तरह निर्दोष थे तो विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
- यदि मामला गंभीर था तो उसे समाप्त करने का आधार क्या है?
- क्या प्रशासनिक नियुक्तियों में पारदर्शिता सुनिश्चित की गई?
सुशासन की कसौटी
सुशासन केवल नीतियों से नहीं, बल्कि निर्णयों की पारदर्शिता से भी तय होता है। जब किसी बड़े आर्थिक विवाद से जुड़े अधिकारी को दोबारा जिम्मेदारी मिलती है, तो जनता यह जानना चाहती है कि प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष और पारदर्शी रही।
राज्य की राजनीति में यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है। अब निगाहें सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया और संभावित स्पष्टीकरण पर टिकी हैं।



