नेहरू से इंदिरा तक, वंदे मातरम् पर संसद में क्यों गरजे अमित शाह? जानिए पूरा बयान

Madhya Bharat Desk
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नई दिल्ली। संसद में वंदे मातरम् को लेकर चल रही चर्चा ने दूसरे दिन और भी सियासी रंग पकड़ लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा में विषय की शुरुआत के बाद अब राज्यसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष, खासकर कांग्रेस पर तीखे सवाल खड़े किए।

गृह मंत्री ने वंदे मातरम् को न सिर्फ एक गीत, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा बताते हुए इसे आज़ादी के आंदोलन, वर्तमान राजनीति और 2047 के विकसित भारत से जोड़ा।

“वंदे मातरम् तब भी ज़रूरी था, आज भी और आगे भी”

राज्यसभा में बोलते हुए अमित शाह ने कहा कि वंदे मातरम् पर चर्चा हर दौर में आवश्यक रही है। यह गीत सदियों के आक्रमणों, जबरन थोपे गए सांस्कृतिक प्रभावों और औपनिवेशिक सोच के खिलाफ भारत की आत्मा का प्रतिरोध था।

उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् के जरिए उस भावना को स्वर दिया, जिसे प्रभु श्रीराम, आचार्य शंकराचार्य और चाणक्य जैसे महान व्यक्तित्वों ने भी अपनाया—मातृभूमि सर्वोपरि है।

नेहरू और इंदिरा गांधी पर सीधा वार

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर निशाना साधते हुए गृह मंत्री ने आरोप लगाया कि वंदे मातरम् की स्वर्ण जयंती के समय इसके केवल दो अंतरों को मान्यता देकर तुष्टीकरण की राजनीति की नींव रखी गई।

अमित शाह का दावा था कि यदि उस दौर में वंदे मातरम् के साथ यह समझौता न हुआ होता, तो देश को विभाजन जैसी त्रासदी का सामना नहीं करना पड़ता।

इसके बाद उन्होंने आपातकाल का जिक्र करते हुए कहा कि जब वंदे मातरम् के 100 वर्ष पूरे हुए, तब इंदिरा गांधी सरकार ने इसे बोलने वालों को जेल में डाल दिया। उन्होंने विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रेस की आज़ादी पर लगी पाबंदियों को याद करते हुए कांग्रेस पर हमला किया।

कांग्रेस पर सदन में वंदे मातरम् रोकने का आरोप

अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व में एक समय संसद में वंदे मातरम् का गायन तक बंद कर दिया गया था। उन्होंने बताया कि वर्ष 1992 में भाजपा सांसद राम नाईक ने इस मुद्दे को उठाया, जिसके बाद लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा स्पीकर से सदन में वंदे मातरम् गाए जाने की मांग की।

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