बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में नालंदा जिला एक बार फिर सियासी सुर्खियों में है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गढ़ माने जाने वाले इस जिले में जनता विकास कार्यों से संतुष्ट दिख रही है, लेकिन स्थानीय विधायकों के रवैये और निष्क्रियता पर असंतोष भी बढ़ रहा है।
2020 के चुनाव में नालंदा की सात में से पांच सीटें जदयू के पास थीं, जबकि भाजपा और राजद को एक-एक सीट मिली थी। इस बार भी जदयू विकास और सुशासन के एजेंडे पर मैदान में है, लेकिन जनता स्थानीय स्तर पर अधूरे कामों और बेरोजगारी से परेशान है।
राजगीर और नालंदा यूनिवर्सिटी से जुड़ी नई परियोजनाओं ने जिले को चर्चा में ला दिया है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अब भी रोजगार और मूलभूत सुविधाओं की कमी की आवाज़ उठ रही है।
सीटवार समीकरण और मुकाबले की तस्वीर:
पहले चरण के तहत 6 नवंबर को वोटिंग होनी है।
- हिलसा सीट पर जदयू के कृष्ण मुरारी शरण और राजद के शक्ति सिंह यादव के बीच कांटे की टक्कर है।
- नालंदा सीट से सात बार के विधायक श्रवण कुमार लगातार आठवीं बार मैदान में हैं, उनके सामने कांग्रेस के कौशलेंद्र कुमार हैं।
- हरनौत में नौ बार जीत चुके हरिनारायण सिंह अपनी दसवीं जीत की कोशिश में जुटे हैं, जिनके सामने कांग्रेस के अरुण कुमार हैं।
- इस्लामपुर, राजगीर, अस्थावां और बिहारशरीफ में भी त्रिकोणीय और बहुकोणीय मुकाबले देखने को मिल रहे हैं।
जातीय समीकरण बनेगा निर्णायक फैक्टर:
2020 के हिलसा नतीजों में जीत का अंतर सिर्फ 12 वोट का था। इस बार भी एनडीए बनाम महागठबंधन के बीच सीधी लड़ाई है। यादव, कुशवाहा, दलित और अल्पसंख्यक वोटों का समीकरण यहां के परिणाम तय करेगा।
राजद जनता के बीच स्थानीय विधायकों की दूरी और बेरोजगारी का मुद्दा उठा रही है, जबकि जदयू अपने विकास कार्यों और नीतीश के भरोसे पर चुनाव मैदान में है।
युवा और महिला वोटर भी होंगे अहम:
नालंदा में बड़ी संख्या में पहली बार वोट करने वाले युवा मतदाता हैं, जिनके लिए रोजगार और शिक्षा मुख्य मुद्दे हैं। दूसरी ओर, महिला मतदाता उज्ज्वला योजना, जल-जीवन-हरियाली, और स्व-रोजगार योजनाओं को लेकर नीतीश सरकार पर भरोसा जता रही हैं।
कुल मिलाकर, नालंदा में इस बार परीक्षा सिर्फ विकास की नहीं, बल्कि नीतीश की साख और स्थानीय नेताओं की जिम्मेदारी की भी है।







