बिहार में शाह की शतरंज: हर चाल में छिपा सत्ता का बड़ा खेल

Madhya Bharat Desk
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PM chairs a first Union Cabinet meeting, in New Delhi on June 10, 2024.

अमित शाह का ‘बिहार गेम’: बीजेपी की लंबी रणनीतिक बिसात

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जिस तरह से कदम उठा रही है, उसे राजनीतिक गलियारों में केंद्रीय गृह मंत्री और पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार अमित शाह की दूरदर्शी रणनीति का परिणाम माना जा रहा है। ये चालें न सिर्फ बीजेपी की वर्तमान स्थिति को मजबूत कर रही हैं, बल्कि राज्य की भविष्य की राजनीति में भी पार्टी के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रही हैं।

रणनीति के प्रमुख बिंदु, जो अमित शाह की प्रतिष्ठा को बढ़ा रहे हैं:

* नीतीश कुमार को CM पद देना (बड़ी कुर्बानी, बड़ा लाभ):

* पिछले चुनाव में जेडीयू से ज्यादा सीटें होने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखना, बीजेपी का एक बड़ा रणनीतिक कदम था।

* इससे गठबंधन में स्थिरता का संदेश गया और नीतीश के साथ रहने वाले एक बड़े वर्ग का भरोसा जीता गया। यह चाल बिहार में नेतृत्व की महत्वाकांक्षा को फिलहाल गौण रखकर, बड़े लक्ष्य (राज्य में अपना आधार मजबूत करना) पर फोकस करने की ओर इशारा करती है।

* सम्राट चौधरी पर भरोसा और ‘पिछड़ा कार्ड’:

* पिछड़े समाज से आने वाले सम्राट चौधरी को  उपमुख्यमंत्री पद की  महत्वपूर्ण भूमिका देना, बीजेपी के ‘पिछड़ा समाज’ पर मजबूत पकड़ बनाने के इरादे को दर्शाता है।

* इससे विपक्षी दलों के ‘जातिगत राजनीति’ के आरोपों के बावजूद, बीजेपी ने अपनी पैठ निचले स्तर तक मजबूत करने का स्पष्ट संदेश दिया है।

* दलित और महादलित नेताओं को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व:

* चिराग पासवान (दलित) और जीतन राम माँझी (महादलित) को सम्मानजनक सीटें देकर बीजेपी ने एनडीए का सामाजिक समीकरण मजबूत किया है।

* यह कदम दलित-महादलित वोट बैंक को एकजुट रखने और महागठबंधन के ‘सामाजिक न्याय’ के दावे को कमजोर करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

* उपेंद्र कुशवाहा को साथ लेना (विपक्षी खेमे में सेंध):

* कभी बीजेपी के आलोचक रहे उपेंद्र कुशवाहा को भरोसे में लेना, दिखाता है कि शाह सभी छोटे क्षेत्रीय दलों को साधने की कला में माहिर हैं।

* यह न केवल कुशवाहा के कोइरी/कुशवाहा वोट बैंक को एनडीए के पाले में लाने में मदद करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि बीजेपी गठबंधन धर्म में पुराने मतभेदों को भुलाकर ‘एकजुटता’ का प्रदर्शन कर सकती है।

* ‘बड़े भाई’ की छवि से मुक्ति और सीट बंटवारे में मनोवैज्ञानिक जीत:

* सीट बँटवारे में जेडीयू के बराबर (101-101) सीटें लेना, बीजेपी को ‘छोटे भाई’ की पुरानी छवि से बाहर निकालता है और पार्टी कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास भरता है।

* यह दिखाता है कि बीजेपी अब बिहार में भी बराबरी की हिस्सेदारी से नेतृत्व की भूमिका की ओर बढ़ रही है।

* 71 उम्मीदवारों की घोषणा कर ‘लीड लेना’ (मनोवैज्ञानिक बढ़त):

* जहां महागठबंधन अभी भी सीट बंटवारे और उम्मीदवारों के नामों पर फंसा हुआ है, वहीं बीजेपी ने पहले चरण के लिए 71 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुनाव प्रचार अभियान में मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली है।

* यह तेजी एनडीए के एकजुट और निर्णायक होने का संदेश देती है, जबकि महागठबंधन की अंदरूनी खींचतान को उजागर करती है।

निष्कर्ष:

इन सभी कदमों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि अमित शाह बिहार में केवल चुनाव नहीं, बल्कि लंबा गेम खेल रहे हैं। उनका लक्ष्य सिर्फ सत्ता में आना नहीं, बल्कि राज्य के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को इस तरह से साधना है कि आने वाले समय में बीजेपी, अपने दम पर, राज्य की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरे।

जैसे-जैसे चुनाव अभियान आगे बढ़ेगा, बीजेपी की यह संगठनात्मक और चुनावी आक्रामकता महागठबंधन पर दबाव बनाएगी। शाह की ‘ऑल इज वेल’ की रणनीति एनडीए को एक मजबूत और निर्णायक धुरी के रूप में पेश कर रही है, जिसकी कमान अब पूरी तरह उनके हाथ में है।

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