छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक ने हाल ही में रायपुर के कुकुरबेड़ा (सरस्वती नगर) क्षेत्र में एक संवेदनशील घटना की सुनवाई करते हुए पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय थाना पुलिस ने पीड़ित महिलाओं की शिकायत दर्ज करने में देरी बरती, जबकि बजरंग दल से जुड़ी शिकायत तुरंत दर्ज कर ली गई। इस अंतर को देखते हुए उन्होंने टिप्पणी की — “क्या थाने बजरंग दल के इशारे पर काम कर रहे हैं?”
यह विवाद उस समय शुरू हुआ, जब बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि एक मकान में धर्मांतरण की कार्रवाई हो रही है। उन्होंने हंगामा किया, और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
महिला आयोग ने अपनी सुनवाई में पाया कि:
पीड़ित महिलाओं की शिकायत 10 दिन बाद दर्ज हुई, जबकि बजरंग दल द्वारा लगाई गई शिकायत को वहीं दिन दर्ज किया गया।
आरोप है कि थाना पुलिस ने महिलाओं को घटनास्थल से दूर ले जाकर उनकी आवाज दबाई, और उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया।
आयोग ने रायपुर SSP को पूरी रिपोर्ट भेजने और निष्पक्ष जांच के आदेश दिए हैं।
इन आरोपों और आयोग की कार्रवाई को देख कर दो बड़े सवाल सामने आते हैं:
> (1) क्या पुलिस तटस्थ है?
यदि यह बात सच है कि कुछ शिकायतों को तुरंत दर्ज किया गया जबकि अन्य को लम्बे समय तक रोका गया, तो यह निष्पक्षता पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता है।
(2) धर्म-संवेदनशील मामलों में बाहरी दबाव का प्रभाव:
धार्मिक और सामाजिक संगठन अक्सर दबाव बना सकते हैं। यदि थाने अपनी कार्रवाई में उनकी मांगों के अधीन हों, तो आम नागरिकों की न्याय की उम्मीद कमजोर हो जाती है।



