8 महीने फरार रहने के बाद आजीवन कारावासी कैदी ने किया आत्मसमर्पण, जेल प्रशासन पर रिश्वतखोरी और उत्पीड़न के गंभीर आरोप

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। अंबिकापुर सेंट्रल जेल से फरार हत्या के दोषी आजीवन कारावासी कैदी मुकेश कांत ने लगभग आठ महीने बाद बिलासपुर कलेक्टर कार्यालय में आत्मसमर्पण कर दिया है। मुकेश कांत वर्ष 2013 से आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। फरवरी 2025 में इलाज के दौरान अस्पताल ले जाए जाने पर वह पुलिस की निगरानी से फरार हो गया था। उसके बाद से पुलिस और जेल प्रशासन लगातार उसकी तलाश में जुटा रहा, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिल पाया। अब आठ महीने बाद उसने स्वयं सामने आकर सरेंडर किया है।

मुकेश कांत ने आत्मसमर्पण के दौरान न केवल खुद को पुलिस के हवाले किया, बल्कि जेल प्रशासन पर गंभीर आरोप भी लगाए हैं। उसने कलेक्टर को सौंपे गए अपने लिखित शिकायत पत्र में अंबिकापुर जेल के अधिकारियों और कर्मचारियों पर रिश्वतखोरी, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। शिकायत में बताया गया है कि जेल के अंदर बंदियों से पैसों की वसूली की जाती है और जो पैसे नहीं देते, उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। मुकेश ने यह भी आरोप लगाया कि उससे बार-बार उसके परिवार से पैसा मंगवाने का दबाव बनाया गया और ऐसा न करने पर उसे परेशान किया गया।

अपने आरोपों के समर्थन में मुकेश ने ट्रांजेक्शन डिटेल्स भी प्रस्तुत किए हैं, जिनमें कथित रूप से जेल अधिकारियों या उनके परिजनों के खातों में भेजी गई रकम का उल्लेख है। उसने बताया कि जब उसने इस वसूली का विरोध किया, तो उसके साथ दुर्व्यवहार और धमकी दी गई। मुकेश ने जेल की सुरक्षा व्यवस्था और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर भी चिंता जताई है। उसने कलेक्टर से अनुरोध किया है कि उसे बिलासपुर सेंट्रल जेल में ट्रांसफर किया जाए, ताकि वह निष्पक्ष माहौल में अपनी सजा काट सके।

कलेक्टर कार्यालय में आत्मसमर्पण की जानकारी मिलते ही पुलिस और जेल विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे और मुकेश को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की। वहीं, अंबिकापुर जेल प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

जेल प्रशासन पर लगे इन गंभीर आरोपों ने जेल व्यवस्था की पारदर्शिता और मानवाधिकारों की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च अधिकारियों द्वारा जांच की संभावना जताई जा रही है। यह प्रकरण न केवल जेल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि जेलों में मानवाधिकारों की रक्षा के मुद्दे को भी सामने लाता है।

 

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