जलाशयों में गिरावट: माताटीला सहित 18 डैम में पानी 50% से कम; पीने-पानी व सिंचाई प्रभावित

Madhya Bharat Desk
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उत्तर प्रदेश में जल संसाधनों की स्थिति एक अहम चिंता का विषय बन चुकी है। राज्य में मौजूदा समय में लगभग 51 छोटे-बड़े डैम हैं। इन में से कम-से-कम 12 से 18 डैम ऐसे हैं जिनका जल स्तर उनकी पूरी क्षमता का आधा या उससे भी कम है।

इन डैमों की मौजूदा स्थिति सिर्फ जल भंडारण की समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर बिजली उत्पादन, सिंचाई, नलकूपों, पीने-पानी की आपूर्ति और व्यापक तौर पर कृषकों तथा ग्रामीण जीवन पर पड़ सकता है।

मुख्य बिंदु

1. रिहंद डैम की हाल-स्थिति

रिहंद, यूपी का सबसे बड़ा कृत्रिम जलाशय है।

कुछ समय पहले जहां इसके गेट लगातार खोले गए थे क्योंकि पानी का inflow अधिक था, वहां अब जलस्तर में कमी हो रही है और गेट बंद किए जाने लगे हैं।

बिजली उत्पादन के लिए टरबाइनों का उपयोग किया जा रहा है, परन्तु यदि पानी और कम हुआ तो बिजली उत्पादन प्रभावित होगा।

2. अन्य डैमों की हालत

18 डैम ऐसे हैं जिनका जल स्तर 50% से कम है।

छोटे और मध्यम डैम विशेष रूप से अधिक प्रभावित हैं, क्योंकि उनके catchment क्षेत्र छोटे हैं और पानी जमा करने की क्षमता कम है।

माताटीला, मेजा आदि बड़े डैम इस समय अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन लगातार बारिश की कमी के कारण उनकी स्थिति भी अस्थिर हो सकती है।

3. कारण

मानसून की अनियमितता एवं अपेक्षित वर्षा का न होना।

जलग्रहण (catchment) क्षेत्रों में कमी या नदी-नालों से पानी की कमी।

जल उपयोग एवं जल प्रबंधन की पारंपरिक चुनौतियाँ जैसे कि नदियों और नदी-उपयुक्त जगहों पर अवैध निकासी, गाद भराव आदि।

तापमान वृद्धि और अधिक वाष्पीकरण (evaporation) की मात्रा।

4. परिणाम संभावनाएँ

बिजली उत्पादन में कमी हो सकती है, विशेषकर उन इलाकों में जो डैम से विद्युत सप्लाई पर निर्भर हैं।

सिंचाई प्रभावित होगी; किसानों को पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा।

पीने का पानी कम पड़ेगा, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में जहाँ नलकूपों या स्थानीय जलाशयों पर निर्भरश्ता है।

पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभाव जैसे जल-जीवन में कमी, पौधों एवं पशुओं पर असर, मछली पालन प्रभावित हो सकता है।

जल प्रबंधन (Water management) में नीतिगत चुनौतियाँ बढ़ेंगी।

प्रस्तावित समाधान

बरसात के पानी को अधिक कुशलता से संग्रहित करने के लिए नदियों और नालों की रख-रखाव।

जलाशय की गाद निकासी (desilting) तथा संरक्षण कार्यों को तेज करना।

टिकाऊ सिंचाई तकनीकें अपनाना जैसे कि ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर।

वर्षा जल संचयन (rainwater harvesting) को प्रोत्साहन देना।

पारदर्शी डेटा और निगरानी तंत्र स्थापित करना ताकि जल स्तर की स्थिति समय रहते पता चले।

सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना कि जल की किस तरह बचत की जाए।

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