जनता और संविधान के बीच सेतु है न्यायपालिका, मूल्यों से ही मजबूत होता है लोकतंत्र

Madhya Bharat Desk
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नेपाल-भारत न्यायिक संवाद 2025 में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने कहा कि न्यायपालिका जनता और संविधान के बीच पुल का काम करती है। उन्होंने जोर दिया कि अदालतों की भूमिका केवल विवाद निपटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय, समानता और गरिमा सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी है।

लोकतंत्र को मूल्यों से मिलती है ताकत

सीजेआई गवई ने कहा कि बदलते समय में न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या नहीं करती, बल्कि शासन की दिशा तय करने और नागरिकों का भरोसा बढ़ाने में भी अहम योगदान देती है। लोकतंत्र संस्थानों से नहीं, बल्कि मूल्यों से मजबूत होता है और न्यायपालिका उसी आधार पर लोकतांत्रिक ढांचे को सशक्त करती है।

परंपरागत भूमिका से आगे बढ़ी अदालतें

उन्होंने कहा कि पहले अदालतों को केवल कानूनी किताबों के अनुसार निर्णय देने वाली संस्था माना जाता था। लेकिन अब न्यायपालिका सक्रिय भूमिका निभाते हुए कानून की गहराई और उसके सामाजिक प्रभाव को ध्यान में रखकर फैसले ले रही है। यही सक्रियता उसकी पहचान बन गई है।

सुधार और तकनीक से जुड़ा न्याय

सीजेआई ने बताया कि भारत का सुप्रीम कोर्ट प्रशासनिक और संस्थागत सुधारों के जरिए भी लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है। केस मैनेजमेंट, डिजिटल स्ट्रक्चर और न्याय तक आसान पहुंच को बढ़ावा दिया गया है।

डिजिटल क्रांति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत के 95% गांव इंटरनेट से जुड़ चुके हैं और 2014 से 2024 के बीच इंटरनेट उपयोगकर्ता 280% बढ़े हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान तकनीक आधारित सुधारों ने न्याय प्रणाली को और तेज बनाया और न्याय तक पहुंच को आसान किया।

वैश्विक न्यायपालिका का साझा अनुभव

सीजेआई गवई ने कहा कि आज न्यायपालिकाएं वैश्विक स्तर पर जुड़ी हुई हैं। इसलिए एक-दूसरे के अनुभवों से सीखना और सुधार अपनाना आधुनिक न्यायपालिका की मजबूती और विकास के लिए बेहद जरूरी है।

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