भाद्रपद शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला ऋषि पंचमी व्रत धर्म, तपस्या और सात्त्विक जीवन का प्रतीक माना जाता है। यह दिन सप्तऋषियों – कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, जमदग्नि, गौतम, भारद्वाज और विश्वामित्र – की आराधना और स्मरण का पर्व है। वेदों के उपदेशक इन ऋषियों ने समाज को धर्म और शास्त्रों की दिशा दिखाई, इसी कारण इस दिन का विशेष महत्व है।
ऋषि पंचमी का महत्व
धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत विशेषकर स्त्रियों के लिए आत्मशुद्धि और पवित्रता का अवसर होता है। माना जाता है कि मासिक धर्म के समय यदि अनजाने में भी धर्मविरुद्ध कार्य हो जाए तो इस व्रत से उसका दोष नष्ट होता है। साथ ही, यह पर्व सात्त्विकता, अनुशासन और धर्मपालन की परंपरा को मजबूत करता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत करने से सप्तऋषियों का आशीर्वाद मिलता है और जीवन मंगलमय बनता है।
पूजन की विधि
इस दिन महिलाएं स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। पूजा स्थल पर चौकोर मंडल बनाकर सप्तऋषियों की प्रतिमा या चित्र स्थापित किए जाते हैं। यदि प्रतिमा उपलब्ध न हो तो सात पात्रों में जल, चावल और पुष्प रखकर प्रतीकात्मक पूजा की जाती है। पूजा में गंगाजल, दूध, पंचामृत, चंदन, रोली, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। सप्तऋषियों के नाम स्मरण के साथ पुष्प अर्पित करना आवश्यक माना गया है। अंत में व्रती महिलाएं ऋषियों से क्षमा याचना करती हैं।
तुलसी पूजन का महत्व
ऋषि पंचमी पर तुलसी पूजन की विशेष परंपरा है। इस दिन तुलसी के पौधे के सामने दीपक जलाया जाता है और 108 परिक्रमा की जाती है। मान्यता है कि तुलसी की आराधना से व्रत का फल सिद्ध होता है और ऋषियों की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही, यह पूजा शुद्धता, सात्त्विकता और स्वास्थ्य वृद्धि का कारण बनती है। इस दिन फलाहार करना ही उचित माना गया है।
व्रत का पुण्यफल
ऋषि पंचमी व्रत से स्त्रियों को धार्मिक शुद्धता और आत्मबल की प्राप्ति होती है। यह व्रत न केवल पूर्व जन्मों के दोषों का निवारण करता है बल्कि परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का मार्ग भी खोलता है। सप्तऋषियों की कृपा से जीवन में स्थिरता और संतुलन बना रहता है।



