अगर आपको डायबिटीज है या इसके शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं, तो डॉक्टर अक्सर HbA1c टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। यह कोई सामान्य ब्लड टेस्ट नहीं, बल्कि आपके पिछले 2-3 महीनों के औसत ब्लड शुगर लेवल का पूरा आंकड़ा देता है। इस टेस्ट को ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट भी कहा जाता है और इसे डायबिटीज की पहचान और प्रबंधन का सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को, खासतौर पर जिनका वजन ज्यादा है, हाई बीपी, कोलेस्ट्रॉल की समस्या, डायबिटीज का पारिवारिक इतिहास या गर्भावस्था में शुगर की समस्या रही हो, उन्हें नियमित रूप से यह टेस्ट करवाना चाहिए।

नॉर्मल रेंज क्या है?
अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के अनुसार:
- 5.7% से कम: सामान्य
- 5.7% से 6.4%: प्रीडायबिटीज
- 6.5% या उससे अधिक: डायबिटीज
समय पर यह टेस्ट कराने से हार्ट डिजीज, किडनी फेलियर और आंखों की रोशनी पर पड़ने वाले असर को कम किया जा सकता है।

टेस्ट कैसे करता है काम?
हमारे खून में मौजूद हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन ले जाने का काम करता है। जब ब्लड शुगर ज्यादा होती है, तो उसका कुछ हिस्सा हीमोग्लोबिन से जुड़ जाता है। HbA1c टेस्ट यह मापता है कि आपके हीमोग्लोबिन का कितना प्रतिशत हिस्सा शुगर से जुड़ा है। चूंकि लाल रक्त कोशिकाएं लगभग 3 महीने तक जीवित रहती हैं, यह टेस्ट आपके पिछले 2-3 महीनों के औसत शुगर स्तर को दर्शाता है।

किन्हें और कब कराना चाहिए यह टेस्ट?
- डायबिटीज मरीजों को साल में 2-4 बार
- प्रीडायबिटीज या जोखिम वाले लोगों को डॉक्टर की सलाह पर हर 6 महीने में
- हाई बीपी, मोटापा या कोलेस्ट्रॉल के मरीजों को नियमित रूप से

ध्यान रखने योग्य बातें
जिन लोगों को पहले से आयरन की कमी, रक्त संबंधी रोग या हाल ही में ब्लड ट्रांसफ्यूजन हुआ हो, उनके टेस्ट रिजल्ट प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए रिपोर्ट की व्याख्या डॉक्टर से करवाना जरूरी है।







