किसानों की सबसे पहली लड़ाई न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की नहीं, बल्कि अपनी जमीन की होती है। आज लोग सिर्फ 2020 के किसान आंदोलन को याद करते हैं, लेकिन उससे पहले भी किसानों ने कई अहम लड़ाइयाँ लड़ीं, जिनमें वर्ष 2015 का भूमि अधिग्रहण विधेयक प्रमुख है।
वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने “भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार (संशोधन) विधेयक 2015” पेश किया था। इस विधेयक के माध्यम से किसानों की जमीन किसी भी निजी संस्था को सरकार की मंशा से आसानी से दी जा सकती थी। यह कानून किसानों के हितों के खिलाफ माना गया, क्योंकि इससे उनकी ज़मीन पर सीधा खतरा उत्पन्न हो सकता था।
इस विधेयक के खिलाफ कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में संसद से लेकर सड़कों तक जोरदार आंदोलन किया। उस समय की मोदी सरकार इस विधेयक को हर हाल में पास कराना चाहती थी, लेकिन कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के साथ-साथ एनडीए के सहयोगियों के विरोध के चलते इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजना पड़ा।
राहुल गांधी ने इस मुद्दे को किसानों की जमीन की रक्षा से जोड़ा और इसे किसानों की असली लड़ाई बताया। उनका कहना था कि यदि यह कानून पास हो जाता, तो किसान अपनी जमीन से हमेशा के लिए बेदखल हो सकते थे।
भारी विरोध और बहस के बाद अंततः यह विधेयक पास नहीं हो सका और समय की प्रक्रिया में लैप्स हो गया। उस वक्त तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली भी जीवित थे और इस विधेयक के पक्ष में सरकार की रणनीति का अहम हिस्सा थे।
यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि किसानों की असल चिंता उनकी जमीन की रक्षा से जुड़ी होती है, और किस तरह विपक्ष की एकजुटता से एक बड़ा कानून टल गया।



