बेंगलुरु।जामखंडी के रामतीर्थ मंदिर परिसर में इस्लाम के प्रचार को लेकर दर्ज एक संवेदनशील मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में तीन मुस्लिम युवकों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज कर दिया। मंदिर जैसी पवित्र जगह पर धार्मिक प्रचार और कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब एक व्यापक सामाजिक और संवैधानिक बहस का कारण बन गया है।
मामले की पृष्ठभूमि:
मंदिर में मौजूद श्रद्धालु शैल आप्टे ने पुलिस को शिकायत दी थी कि तीन मुस्लिम युवक मंदिर परिसर में इस्लाम का प्रचार करते हुए पर्चे बांट रहे थे और हिंदू देवी-देवताओं के प्रति अपमानजनक बातें कर रहे थे। शिकायत के आधार पर पुलिस ने BNS की धारा 299 (धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना), 351(2) (धमकी) और KPRFR अधिनियम, 2022 की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी।
कोर्ट ने FIR क्यों रद्द की?
उच्च न्यायालय ने दो प्रमुख बिंदुओं पर विचार करते हुए FIR को खारिज किया:
- लोकस स्टैंडी का अभाव:
अदालत ने कहा कि KPRFR अधिनियम के अनुसार केवल धर्मांतरण से प्रभावित व्यक्ति या उसके निकट संबंधी को ही शिकायत दर्ज करने का अधिकार है, जो इस मामले में नहीं था। - ठोस प्रमाण की कमी:
कोर्ट ने पाया कि पर्चे बांटना या मौखिक रूप से धार्मिक विचार साझा करना तब तक अपराध नहीं है जब तक उसमें जबरदस्ती, धोखा या लालच शामिल न हो।
न्यायिक निष्कर्ष:
अदालत ने कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए थे, और प्रक्रियागत कमियों के कारण एफआईआर रद्द की जाती है।
सामाजिक और संगठनों की प्रतिक्रिया:
विहिप और बजरंग दल जैसे हिंदू संगठनों ने इस फैसले को मंदिरों की सुरक्षा में कमजोरी बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे वैचारिक अतिक्रमण कहा। दूसरी ओर, मुस्लिम संगठनों ने इसे संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता की जीत बताया।
संवैधानिक प्रावधान क्या कहते हैं?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को धर्म का प्रचार, अभ्यास और पालन करने की स्वतंत्रता देता है, जब तक वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की मर्यादाओं के भीतर हो। सुप्रीम कोर्ट भी स्पष्ट कर चुका है कि जबरन धर्मांतरण अपराध है, लेकिन स्वैच्छिक प्रचार मौलिक अधिकार है।
कानून बनाम आस्था का संतुलन:
यह निर्णय यह बताता है कि धार्मिक प्रचार तब तक अपराध नहीं है जब तक उसमें जबरदस्ती या अपमान का इरादा शामिल न हो। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या धार्मिक स्थलों की गरिमा की रक्षा के लिए विशेष कानूनों की जरूरत है?
सिफारिशें और चिंतन:
- धार्मिक स्थलों पर प्रचार को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार हों
- न्यायिक प्रक्रिया में सामाजिक संवेदनशीलता का समावेश हो
- धार्मिक सहिष्णुता और संवाद को बढ़ावा देने की पहल हो
कानूनी दृष्टि से यह फैसला भले ही सटीक हो, लेकिन सामाजिक और धार्मिक भावनाओं पर इसका प्रभाव गहरा है। यह मामला भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक स्थलों की पवित्रता के बीच संतुलन को लेकर एक नई बहस को जन्म देता है, जिससे भविष्य की नीतियों और न्यायिक फैसलों की दिशा तय हो सकती है।



