बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे अभियान के कारण लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा सकते हैं। यह प्रक्रिया मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए की जा रही है, जिसमें यह जांचा जा रहा है कि सूची में शामिल लोग वास्तव में वहां रहते हैं या नहीं, उनकी मृत्यु हो चुकी है या वे कहीं और शिफ्ट हो चुके हैं।
चुनाव आयोग ने बताया कि इस प्रक्रिया के 10 प्रमुख उद्देश्य हैं, जिनमें से 2 पर अभी काम जारी है। अब तक बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) अपना काम पूरा कर चुके हैं, और अब जिम्मेदारी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ERO) के पास है। प्रदेश में कुल 243 ERO और 2,976 सहायक अधिकारी नियुक्त किए गए हैं, जो दावों और आपत्तियों पर अंतिम निर्णय लेंगे।
एसआईआर के तहत अब तक जो आंकड़े सामने आए हैं, उनके अनुसार लगभग 22 लाख लोग ऐसे हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है, जबकि 7 लाख लोग एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत हैं। इसके अलावा 36 लाख लोग स्थायी रूप से किसी अन्य स्थान पर शिफ्ट हो चुके हैं, जिनका पता अब नहीं चल पा रहा है। ऐसे लोगों के नाम हटाने की प्रक्रिया जारी है। वहीं कई लोगों ने 25 जुलाई की डेडलाइन भी मिस कर दी है।
चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी मतदाता का नाम बिना नोटिस और पक्ष रखने का मौका दिए बिना नहीं हटाया जाएगा। मतदाता चाहे तो जिला कलेक्टर (DM) या मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (CEO) के पास अपील कर सकता है। इसके लिए विशेष फॉर्मेट भी जारी किया गया है, और वॉलंटियर्स को ट्रेनिंग देकर अपील करने में सहायता दी जाएगी।
अब तक 91.69% मतदाताओं ने फार्म भर दिए हैं और 1 अगस्त 2025 तक इन सभी का स्टेटस क्लियर कर दिया जाएगा। यह तिथि ERO द्वारा जांच प्रक्रिया पूरी करने की अंतिम डेडलाइन मानी जा रही है।
इस पूरी प्रक्रिया का विपक्षी दल जैसे राजद और कांग्रेस विरोध कर रहे हैं। तेजस्वी यादव ने तो चुनाव प्रक्रिया के बहिष्कार तक की बात कह दी है। हालांकि आयोग का दावा है कि यह कवायद स्वच्छ और पारदर्शी मतदाता सूची के लिए की जा रही है और किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है।



