छत्तीसगढ़ में पीएम आवास योजना का सच: फाइलों में ‘पूरा’, ज़मीन पर अधूरा

Madhya Bharat Desk
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सरकारी फाइलों में सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है—लक्ष्य पूरे, भुगतान जारी, और घर तैयार। लेकिन जैसे ही इन दावों की सच्चाई जानने के लिए गांवों की ओर कदम बढ़ते हैं, तस्वीर बदल जाती है। अधूरी दीवारें, बिना छत के मकान, खाली प्लॉट और ऐसे नाम जिनके पीछे असली लाभार्थी मौजूद ही नहीं।

छत्तीसगढ़ में गरीबों को पक्की छत देने के उद्देश्य से चलाई जा रही प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) कई जिलों में सवालों के घेरे में है। हाल ही में जारी 2023 की सीएजी ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि कई जगहों पर पैसा जारी हो गया, लेकिन मकान बने ही नहीं। कहीं अपात्र लोगों को लाभ दे दिया गया, तो कहीं बिना जमीन वाले 250 लोगों को आवास स्वीकृत कर लगभग 4.5 करोड़ रुपये जारी कर दिए गए।

जमीनी हकीकत: अधूरे सपनों के घर

गरियाबंद जिले के करीब 20 गांवों में की गई पड़ताल में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
लफंदी ग्राम पंचायत में रोजगार सहायक ने 40 हितग्राहियों की मजदूरी फर्जी मजदूरों के नाम पर दिखाकर 4 लाख से अधिक की राशि निकाल ली। यह गड़बड़ी तब सामने आई जब लाभार्थियों ने खुद ऑनलाइन मस्टररोल चेक किया।

महासमुंद जिले के बागबाहरा ब्लॉक में हजारों लोगों को पहली किस्त में सिर्फ 25 हजार रुपये मिले, लेकिन दूसरी किस्त अब तक अटकी हुई है। 12,366 हितग्राही अपने कच्चे घर तोड़ चुके हैं, पर नई छत का इंतजार कर रहे हैं। कई परिवार प्लास्टिक ढंककर अस्थायी झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं।

मैनपुर ब्लॉक के कुहामेटा गांव के पीलाराम बताते हैं कि उनकी पत्नी के नाम से आवास स्वीकृत हुआ था। दो किस्त मिलने के बाद काम रुक गया। एक साल से छत नहीं डली। मजबूरी में उन्होंने बांस का सहारा लेकर ढांचा खड़ा कर रखा है। गांव के 145 में से अधिकांश घर अधूरे हैं।

राजापड़ाव की सुगारो बाई के घर में सिर्फ डेढ़-दो फीट दीवार उठी है। एक साल से काम बंद है। जनप्रतिनिधियों से पूछने पर सिर्फ आश्वासन मिलता है—“बन जाएगा।”

जाड़ापदर गांव की हिरमनी बंजारे को तो यह तक नहीं पता कि उनके नाम पर मकान कब और कहां बन गया। सरकारी रिकॉर्ड में उनका घर पूरा दिखाया गया है, जबकि हकीकत में उन्हें कोई लाभ नहीं मिला।

सिस्टम की परतें और गड़बड़ी

जांच में सामने आया कि एमआईएस एंट्री, बैंक ट्रांसफर, जियो-टैगिंग और पंचायत स्तर की निगरानी—हर स्तर पर खामियां रहीं।

  • एक ही व्यक्ति को ग्रामीण और शहरी दोनों योजनाओं का लाभ
  • गलत खातों में भुगतान
  • फर्जी तस्वीरों से अधूरे घरों को “पूर्ण” दिखाना
  • मृत और अपात्र लोगों के नाम जोड़ना
  • बिना भौतिक सत्यापन भुगतान स्वीकृत करना

गरियाबंद के मैनपुर जनपद में 3,817 घरों को कागजों में पूरा दिखाकर सामूहिक गृह प्रवेश भी करा दिया गया। लेकिन मौके पर कई मकानों की छत तक नहीं बनी थी।

आंकड़े बनाम असलियत

राज्य में योजना के तहत 24 लाख घर बनाने का लक्ष्य है। 18 लाख घर पूरे होने का दावा किया गया है। पिछले 10 महीनों में 5 लाख घर पूरे करने की बात कही गई है। लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।

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