सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कई राज्यों में रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) के कामकाज पर गंभीर नाराज़गी जताई। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि राज्य सरकारें इस प्राधिकरण के गठन के अपने फैसले पर पुनर्विचार करें।
खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची भी शामिल थे, ने कहा कि RERA डिफॉल्टर बिल्डरों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने के बजाय उन्हें सुविधाएं देने वाला मंच बनता जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि संस्था अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पा रही है, तो इसे समाप्त करने पर भी विचार किया जा सकता है।
यह टिप्पणी हिमाचल प्रदेश सरकार की उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसने शिमला से धर्मशाला RERA कार्यालय स्थानांतरित करने के निर्णय पर रोक लगा दी थी।
राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दिवान ने अदालत को बताया कि संबंधित जनहित याचिका एक प्रॉपर्टी डीलर द्वारा दायर की गई थी। वहीं प्रतिवादी पक्ष ने दलील दी कि याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता पर पहले ही सवाल उठ चुके हैं और हाईकोर्ट चाहें तो एमिकस क्यूरी नियुक्त कर सकता था।
प्रतिवादी वकील ने यह भी कहा कि RERA में चेयरमैन की नियुक्ति में देरी हुई है और कार्यालय को धर्मशाला स्थानांतरित करने से शिमला में मौजूद अधिकांश हितधारकों को असुविधा होगी, क्योंकि लगभग 90% संपत्तियां और शिकायतें शिमला से जुड़ी हैं।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी और RERA कार्यालय को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित करने की राज्य सरकार को अनुमति दे दी।







