छत्तीसगढ़ में संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर कार्यरत कर्मचारियों के बीच असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। आरोप है कि नियमित भर्ती प्रक्रिया से नियुक्त होने के बावजूद उन्हें शासन द्वारा दी जा रही मूलभूत सुविधाओं, विशेषकर स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है।
संविदा कर्मचारियों का कहना है कि वे वही काम करते हैं, जो नियमित कर्मचारी करते हैं। जिम्मेदारियां समान हैं, कार्यभार समान है, लेकिन जब बात सुविधाओं की आती है तो उनके साथ अलग व्यवहार किया जाता है।
राज्य में नियमित सरकारी कर्मचारियों को छत्तीसगढ़ शासन की स्वास्थ्य योजनाओं और अन्य सुविधाओं का पूर्ण लाभ मिल रहा है। वहीं दूसरी ओर, संविदा कर्मचारी और उनके परिवार — यहां तक कि उनके माता-पिता — इन सुविधाओं से बाहर हैं। इससे उनके भीतर असुरक्षा और असमानता की भावना गहराती जा रही है।
कर्मचारियों का यह भी दावा है कि यह स्थिति “रिक्त पदों की भर्ती की अधिसूचना की अनिवार्यता अधिनियम 1959” और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) की भावना के विपरीत है। अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समान कार्य के बदले समान वेतन और सुविधाओं की अवधारणा को लागू नहीं किया गया, तो यह प्रशासनिक असंतुलन और कानूनी चुनौती का कारण बन सकता है।
संविदा कर्मचारियों का कहना है कि वे किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे, बल्कि वही अधिकार चाहते हैं जो नियमित कर्मचारियों को मिल रहे हैं — खासकर स्वास्थ्य सुरक्षा, जो आज के समय में सबसे बुनियादी आवश्यकता बन चुकी है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या शासन इस मुद्दे पर स्पष्ट नीति बनाएगा या फिर संविदा कर्मचारियों को न्याय के लिए कानूनी रास्ता अपनाना पड़ेगा?



