जंगलों का अदृश्य छाया हिडमा, देश को हिलाने वाले हमलों का मास्टरमाइंड, जाने आखिर कैसे बच जाता था?

Madhya Bharat Desk
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दक्षिण बस्तर के घने जंगलों में सालों तक सुरक्षा बलों को चकमा देने वाला और गुरिल्ला युद्ध में माहिर कुख्यात नक्सल कमांडर माडवी हिडमा आखिरकार ढेर हो गया। अत्याधुनिक हथियारों से लैस अपनी विशाल टुकड़ी और चार-स्तरीय सुरक्षा घेरा होने के कारण हिडमा एक लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से दूर रहा।

देश में 26 से अधिक बड़े नक्सली हमलों का मास्टरमाइंड माने जाने वाले हिडमा पर एक करोड़ रुपये से ज्यादा का इनाम घोषित था। बस्तर से माओवादी शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने वाला वह एकमात्र आदिवासी सदस्य था, जो पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बैटालियन नंबर-1 का प्रमुख भी रहा। उसकी कमान वाली यह यूनिट दंडकारण्य, बस्तर, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना और महाराष्ट्र के इलाकों में माओवादियों का सबसे मजबूत सैन्य गुट माना जाता था।

1990 के दशक के अंत में जमीन स्तर के कार्यकर्ता के रूप में संगठन में शामिल हुए हिडमा ने पिछले दो दशकों में कई बड़े घातक हमलों की साजिश रची। 2010 के ताड़मेटला हमले, जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे, ने उसे सबसे वांछित माओवादी कमांडरों की सूची में शीर्ष पर ला दिया।

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री बंडी संजय कुमार ने कहा कि आदिवासी युवाओं को शहरी नक्सलियों के झांसे में नहीं आना चाहिए, क्योंकि हिंसा का अंत हमेशा मौत या विनाश में ही होता है। उन्होंने कहा कि हिडमा और उसकी पत्नी की मौत इस बात का उदाहरण है कि बंदूक उठाने से किसी को कुछ हासिल नहीं होता, जबकि शहरी नक्सली आरामदायक कमरों में बैठकर युवाओं को हिंसा की तरफ धकेलते हैं।

सुरक्षा बलों का मानना है कि हिडमा का मारा जाना माओवादियों के लिए एक बड़ा रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक झटका है। सूत्रों का कहना है कि मौजूदा अभियान की तेज रफ्तार को देखते हुए 2026 की निर्धारित समय सीमा से पहले ही देश से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।

गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षा एजेंसियों को निर्देश दिया था कि हिडमा को 30 नवंबर से पहले खत्म किया जाए—और बलों ने इस लक्ष्य को निर्धारित तारीख से 12 दिन पहले ही पूरा कर दिखाया।

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