पटना। बिहार विधानसभा चुनाव का प्रचार थम गया है और अब मतदाता के हाथ में है सत्ता की चाबी। मंगलवार को बिहार के 20 जिलों की 122 विधानसभा सीटों पर वोट डाले जाएंगे, जहां जनता अपने मत से तय करेगी कि राज्य की कमान किसे सौंपी जाए।
इस चुनावी जंग में हर दल ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। एनडीए ने विकास, सुशासन और डबल इंजन सरकार के कामकाज को मुद्दा बनाया, जबकि महागठबंधन ने बेरोजगारी, महंगाई और पलायन को केंद्र में रखकर जनता से बदलाव की अपील की।
पिछले एक महीने में बिहार की सियासत ने कई नए नैरेटिव गढ़े—कहीं घुसपैठ और कानून-व्यवस्था पर बयानबाजी हुई तो कहीं युवाओं के रोजगार और किसानों की आय को लेकर वादों की झड़ी लगी। हर पार्टी ने दावा किया कि वही बिहार को नई दिशा दे सकती है, लेकिन अब निर्णय जनता के हाथ में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार का चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य का फैसला होगा। मतदाता जब ईवीएम का बटन दबाएंगे, तो उनके सामने कई सवाल होंगे—क्या राज्य में विकास प्राथमिकता बनेगा या बेरोजगारी और महंगाई से राहत की उम्मीद में जनता बदलाव चुनेगी?
14 नवंबर को मतगणना के दिन साफ हो जाएगा कि बिहार की जनता ने किस नैरेटिव को मंजूरी दी — विकास की निरंतरता या नई दिशा की तलाश।
फिलहाल, हर सियासी गलियारे में एक ही सवाल गूंज रहा है —
कौन बनेगा जनता की पसंद, और किस पर टिकेगा भरोसा?







