छत्तीसगढ़ का सघन और जैव विविधता से भरपूर हसदेव अरण्य वन क्षेत्र एक बार फिर सुर्खियों में है। यह इलाका लंबे समय से हाथियों का प्राकृतिक रहवास और आवाजाही का पारंपरिक मार्ग रहा है। लेकिन अब इस शांत वन क्षेत्र में अडानी समूह की कोयला खनन परियोजनाएं तेजी से फैल रही हैं, जिससे जंगल, वन्यजीव और स्थानीय समुदाय — तीनों पर संकट गहराता जा रहा है।
स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से हाथी लगातार खनन क्षेत्र और परिवहन मार्गों के आसपास देखे जा रहे हैं। आज उन्होंने अचानक कोयला से भरे ट्रकों का रास्ता रोक दिया, जिससे पूरे इलाके में हड़कंप मच गया।
ग्रामीणों का कहना है कि यह हाथियों की नाराजगी और असुरक्षा का परिणाम है — वे अपने आवास और आवाजाही के प्राकृतिक रास्तों पर हो रहे कब्जे का विरोध कर रहे हैं।
“जिन इलाकों को पहले खनन से मुक्त रखा गया था, अब वहीं पर नई खदानें खोली जा रही हैं। जंगल कट रहे हैं, और हाथियों का रास्ता खत्म हो रहा है,” — एक स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता ने बताया।
हसदेव अरण्य को छत्तीसगढ़ का “हरित फेफड़ा” कहा जाता है। यह क्षेत्र न केवल सैकड़ों दुर्लभ प्रजातियों और लाखों पेड़ों का घर है, बल्कि यहां रहने वाले आदिवासी समुदायों की आजीविका और संस्कृति का भी केंद्र है। पर्यावरणविदों का आरोप है कि सरकार “अडानी जैसी कंपनियों के मुनाफे के लिए जंगलों को उजाड़ रही है”, जबकि स्थानीय लोगों की राय और पर्यावरणीय चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।
हाथियों द्वारा ट्रकों को रोकने की यह घटना अब प्राकृतिक प्रतिरोध का प्रतीक बन गई है। यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है — आखिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कब और कैसे बनेगा?



