भारत के प्रमुख लोकपर्वों में से एक छठ पूजा का आरंभ नहाय-खाय से होता है। इस पावन पर्व की शुरुआत आज शनिवार से पूरे उत्साह और आस्था के साथ की गई। इस दिन व्रती महिलाएं और पुरुष प्रातःकाल गंगा नदी या अन्य पवित्र नदियों में स्नान कर नए वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद वे भगवान भास्कर से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पूजा-अर्चना करते हैं।
नहाय-खाय के दिन व्रती विशेष रूप से शुद्ध सात्विक भोजन बनाते हैं। इस दिन बनाए जाने वाले भोजन में लहसुन-प्याज का प्रयोग वर्जित होता है। लौकी-भात, अरवा चावल, चना दाल, आंवला की चटनी, पापड़ आदि को प्रसाद के रूप में बनाया और ग्रहण किया जाता है। सबसे पहले यह भोजन व्रती को परोसा जाता है, उसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन करते हैं।
इसी दिन गेहूं को गंगाजल में धोकर सुखाया जाता है, जिसे बाद में प्रसाद बनाने में प्रयोग किया जाता है। इस गेहूं को किसी पशु-पक्षी या कीड़े को छूने नहीं दिया जाता। इसे व्रती और परिवारजन पारंपरिक लोकगीत गाते हुए सुरक्षित रखते हैं।
पूरे प्रदेश में इस दिन गंगा किनारे और घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। लोग नए वस्त्र धारण कर श्रद्धा और भक्ति भाव से भगवान सूर्य की पूजा करते हैं। इसी के साथ चार दिवसीय छठ महापर्व की शुरुआत होती है, जिसमें अगली कड़ी में खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य जैसे अनुष्ठान शामिल हैं।
यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि परिवार और समाज में एकता, पवित्रता और अनुशासन का संदेश भी देता है। नहाय-खाय से प्रारंभ होकर यह पर्व भक्ति और श्रद्धा के चरम पर जाकर सम्पन्न होता है।



