‘धान का कटोरा’ और ‘ऊर्जा हब’ कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में इन दिनों बिजली बिलों को लेकर जनता में गहरा आक्रोश है। राज्य देश के कोयला और बिजली उत्पादन में प्रमुख भूमिका निभाता है, लेकिन यहाँ के निवासी देश की सबसे महंगी बिजली दरों का सामना कर रहे हैं। जनता सवाल कर रही है:
“कोयला हमारा, पानी हमारा, बिजली घर हमारा—फिर भी सबसे महंगी बिजली क्यों?”
सरकारी दावे बनाम जनता की पीड़ा:
सरकार का दावा है कि 31 लाख परिवार बढ़े हुए बिजली बिलों से लाभान्वित हो रहे हैं, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। पहले 400 रुपये तक आने वाले बिल अब 1200 से 1600 रुपये तक पहुंच गए हैं। उपमुख्यमंत्री अरुण साव द्वारा इसे ‘मामूली वृद्धि’ बताना जनता के लिए सिर पर नमक छिड़कने जैसा है।
विरोध प्रदर्शन और गुस्सा:
अगर सब कुछ लाभकारी है, तो सड़क पर विरोध करने वाले लोग कौन हैं? जनता सवाल कर रही है कि ‘मामूली’ वृद्धि ने बिल को चार गुना कैसे कर दिया?
विदेशी कोयला और ‘ऊर्जा आत्मनिर्भरता’ का खोखला नारा:
जनता का तंज़ साफ है:
“छत्तीसगढ़ के लोग अपने घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाएं, और हमारे कोयले से बनी बिजली दूसरे राज्यों में जाए! क्या यही ऊर्जा आत्मनिर्भरता है?”
‘बिजली का उजाला बढ़ा, पर जेब की रोशनी बुझ गई’:
बिजली उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद, स्थानीय नागरिक महंगी बिजली की मार झेल रहे हैं। यह दिखाता है कि राज्य के कोयला और जल संसाधनों का लाभ स्थानीय जनता तक नहीं पहुंच रहा, बल्कि या तो अन्य राज्यों को जा रहा है या महंगी बिजली के कारण जनता की जेब से वसूला जा रहा है।
आखिरी सवाल:
क्या सरकार आंकड़ों के पर्दे से बाहर निकलकर जनता के असली सवालों का जवाब देगी, या इस ‘ऊर्जा विरोधाभास’ को चुपचाप जारी रखने देगी?







