हाल ही में मध्य प्रदेश के जबलपुर हाई कोर्ट में एक अनोखी और रोचक जनहित याचिका दायर की गई, जिसने सभी का ध्यान खींचा। इस याचिका में याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि ‘मध्य प्रदेश’ को संक्षेप में ‘एमपी’ (MP) या ‘म.प्र.’ (M.P.) कहने या लिखने पर रोक लगाई जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि राज्य के नाम को छोटा करके लिखना या बोलना राज्य की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंचाता है।
याचिका में यह भी कहा गया था कि राज्य सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह यह सुनिश्चित करे कि आधिकारिक पत्राचार, दस्तावेज़ों और अन्य माध्यमों में राज्य का नाम केवल ‘मध्य प्रदेश’ ही लिखा जाए, न कि संक्षेप में एमपी या म.प्र. के रूप में।
हालांकि, सुनवाई के दौरान जब अदालत ने याचिकाकर्ता से यह पूछा कि इस मांग के पीछे क्या जनहित है और इससे आम जनता को क्या लाभ होगा, तो याचिकाकर्ता कोई ठोस जवाब नहीं दे पाया। अदालत ने यह पाया कि इस याचिका में जनहित का कोई स्पष्ट और व्यावहारिक आधार नहीं है।
इसलिए अंत में उच्च न्यायालय ने इस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि ऐसी मांगें अदालत के समय और संसाधनों की अनुचित बर्बादी हैं। यह मामला न केवल कानून की गंभीरता को हल्का करने वाला था, बल्कि इसने जनहित याचिका जैसे महत्वपूर्ण उपकरण का दुरुपयोग भी दर्शाया।







